कितना अजीब है ना, दिसंबर और जनवरी का रिश्ता ? जैसे पुरानी यादों और नए वादों का किस्सा भरपूर विश्वास है दोनों आसपास है फिर भी एक साल की प्यास है ख़ूबसूरत पलों के झरोखे दिल में गुलदस्ते सज़ा लेते हैं गुलाबों के बीच ख़ुद को बगिया बना लेते हैं। इस कद्र को अपने होने का एहसास जगा जाता है गुज़रा साल दिल में दोनो मे गहराई है दोनों वक़्त के राही है यूँ तो दोनों का है वही चेहरा-वही रंग उतनी ही तारीखें पर पहचान अलग है दोनों की अलग है अंदाज़ और अलग हैं ढंग... एक अन्त है एक शुरू
स्त्री विमर्श ---- स्त्री के अस्तित्व को केंद्र में लाकर उसकी मानवीय गरिमा को पुनः प्रतिष्ठित करने का अभियान है । स्त्री के अस्तित्व पर पितृसत्तात्मक समाज का पुरुष वर्ग स्वयं को स्त्री की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने के षड़यंत्र रचता रहा है । उसके वास्तविक अस्तित्व को भंग कर उसका दमन करना और स्त्री के लिए समानता और न्याय की सभी सम्भावनाओ को समाप्त करना रहा है । स्त्री विमर्श का सर्वप्रथम सरोकार पुरुष सत्ता को शक के दायरे में लाना होगा क्यों कि स्त्री पर चिंतन और उसके सभी प्रावधानों ,, तथा नियमों का निर्माण पुरूष ही करते आये हैं । यही वजह थी कि " सिमोन द बाउवर " अपनी कृति में स्वयं लिखती हैं --- अब तक औरत के बारे में पुरूष ने जो कुछ लिखा उस पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि लिखने वाला न्यायाधीश ओर अपराधी दोनों ही है । स्त्री विमर्श -- एक स्त्री की आत्मचेतना ,, उसके अस्तित्व की पहचान स्थापित करने का समकालीन वैचारिक चिंतन है । जो कि परम्परागत दवाब से मुक्त हो कर उसकी पहचान लिंग रूप में नही बल्कि मनुष्य रूप में प्रस्थापित करने...
****** पंडित जी तो महिलाओं को तिलक भी स्वयं नहीं लगाते। पर शादी में अब साड़ी ब्लाउज इत्यादि पहनाने वालों को बुलाया जाने लगा है या इन स्त्रियों को ही सेंटरों पर बुलाया जाने लगा है ! अब किसी भी अवसर पर महिलाओं को साड़ी पहनाने से लेकर, मेहंदी, सैलून, टेलर, टैटू सब काम पुरुष कर रहे हैं, वे भी गैर हिन्दू। ये कथित आधुनिकता हिन्दू समाज को कहाँ तक ले जाएगी……? मेहंदी के बाद अब महिलाओं को साड़ी पहनना भी सेंटरों पर पुरुष सिखा रहे हैं! एक गैर पुरूष द्वारा साड़ी खींचने पर जिस देश में महाभारत हो गई थी उस भारत में स्त्री खुद साड़ी उतारने खड़ी है। हां आज स्त्री स्वयं ही पुरुष से न केवल जिम में अपने निजी अंगों का स्पर्श सुख भोग रही है बल्कि साड़ी भी उतार पहन रही हैं।। ये प्रगति नहीं है संस्कारों का पतन ही हमारी मृत्यु है ?? आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्कृति को मिट्टी मैं मिलाया जा रहा है आज कल की लड़कियों को , अगर उनको साड़ी ना पहन ना आता है तो खुद को मॉडर्न समझती है गर्व से कहती है कि हमे साड़ी पहननी नही आती अभी इससे भी बहुत बुरा बाकी है Kalyuga is l...
Very thoughtful, Superb
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