****** पंडित जी तो महिलाओं को तिलक भी स्वयं नहीं लगाते। पर शादी में अब साड़ी ब्लाउज इत्यादि पहनाने वालों को बुलाया जाने लगा है या इन स्त्रियों को ही सेंटरों पर बुलाया जाने लगा है ! अब किसी भी अवसर पर महिलाओं को साड़ी पहनाने से लेकर, मेहंदी, सैलून, टेलर, टैटू सब काम पुरुष कर रहे हैं, वे भी गैर हिन्दू। ये कथित आधुनिकता हिन्दू समाज को कहाँ तक ले जाएगी……? मेहंदी के बाद अब महिलाओं को साड़ी पहनना भी सेंटरों पर पुरुष सिखा रहे हैं! एक गैर पुरूष द्वारा साड़ी खींचने पर जिस देश में महाभारत हो गई थी उस भारत में स्त्री खुद साड़ी उतारने खड़ी है। हां आज स्त्री स्वयं ही पुरुष से न केवल जिम में अपने निजी अंगों का स्पर्श सुख भोग रही है बल्कि साड़ी भी उतार पहन रही हैं।। ये प्रगति नहीं है संस्कारों का पतन ही हमारी मृत्यु है ?? आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्कृति को मिट्टी मैं मिलाया जा रहा है आज कल की लड़कियों को , अगर उनको साड़ी ना पहन ना आता है तो खुद को मॉडर्न समझती है गर्व से कहती है कि हमे साड़ी पहननी नही आती अभी इससे भी बहुत बुरा बाकी है Kalyuga is l...
तू शोर है मेरा, मैं तेरी खामोशी मौनरूपी व्याख्या की महिमा प्रभावशाली होती है । उसके सामने क्या मातृभाषा क्या अन्य देश की भाषा सब को सब कुछ प्रतीत होती है । अन्य कोई भाषा दिव्य नहीं केवल व्याख्यान की मौनभाषा ईश्वरीय है । यदि विचार करके देखा जाए तो मौन व्याख्यान किस तरह हमारे हृदय की नाडी में सुंदरता पिरो देता है । वह व्याख्यान ही क्या जिसमे हृदय की धुन को तथा बल के लक्ष्य को ना बदल दिया । चंद्रमा की मंद मंद हंसी का ,,, तारागणों के कटाक्ष पूर्ण मौन व्याख्यान का प्रभाव । किसी कवि के दिल में घुस कर देखा ,,,, कमल और नरगिस में नयन देखने वालों से पूछो कि मौन व्याख्यान,,, की प्रभुता कितनी दिव्य है ,,, मौन की शक्ति की भावना पर आधारित है कि मौन तो ईश्वर प्रदत्त भाषा है । इससे आत्मिक गुणों का विकास तो होता ही है अपितु आत्मबल भी बढ़ता है । व्याख्यान व्यक्तित्व के निर्माण तथा विचारधारा को पुष्ट करने में अपनी महती भूमिका निभाता है । व्याख्यान अपने आप में अनेक भागों तथा सिद्धांतों को पिरोए हुए होता है । जिससे मानव के हृदय पर अनुकूल प्रभाव पड़े...
स्त्री विमर्श ---- स्त्री के अस्तित्व को केंद्र में लाकर उसकी मानवीय गरिमा को पुनः प्रतिष्ठित करने का अभियान है । स्त्री के अस्तित्व पर पितृसत्तात्मक समाज का पुरुष वर्ग स्वयं को स्त्री की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने के षड़यंत्र रचता रहा है । उसके वास्तविक अस्तित्व को भंग कर उसका दमन करना और स्त्री के लिए समानता और न्याय की सभी सम्भावनाओ को समाप्त करना रहा है । स्त्री विमर्श का सर्वप्रथम सरोकार पुरुष सत्ता को शक के दायरे में लाना होगा क्यों कि स्त्री पर चिंतन और उसके सभी प्रावधानों ,, तथा नियमों का निर्माण पुरूष ही करते आये हैं । यही वजह थी कि " सिमोन द बाउवर " अपनी कृति में स्वयं लिखती हैं --- अब तक औरत के बारे में पुरूष ने जो कुछ लिखा उस पर शक किया जाना चाहिए क्योंकि लिखने वाला न्यायाधीश ओर अपराधी दोनों ही है । स्त्री विमर्श -- एक स्त्री की आत्मचेतना ,, उसके अस्तित्व की पहचान स्थापित करने का समकालीन वैचारिक चिंतन है । जो कि परम्परागत दवाब से मुक्त हो कर उसकी पहचान लिंग रूप में नही बल्कि मनुष्य रूप में प्रस्थापित करने...
Very thoughtful, Superb
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