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Showing posts from April, 2026

हारना नहीं है ,,,,

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हार  कोई  विराम  नहीं  होती, वो  तो  बस  एक  अदृश्य  द्वार  है – जहाँ  से  लौटकर  वही  आता  है जो  खुद  को  फिर  से  गढ़ने  का  साहस  रखता है…  शून्य  तो  सिर्फ़  एक  भ्रम  है, असल  में  हर  गिरावट  अपने  साथ अनकहे  सबक़ों  की  पूँजी  छोड़  जाती  है… इसलिए  जब  तुम  दोबारा  चलोगे, तो  कदम  नए  नहीं  होंगे – पर  उनकी  दिशा  में  वो  गहराई  होगी जो  पहले  कभी  थी  ही  नहीं…  क्योंकि  कुछ  शुरुआतें  दिखाई  नहीं  देतीं, वो  भीतर  होती  हैं – और  वही  शुरुआतें  सबसे  दूर  तक  जाती  हैं…  हार असल में अंत नहीं, बल्कि आत्मा को फिर से तराशने का सबसे सुंदर अवसर है। जो गिरकर भी उठता है, वो सिर्फ़ चलना नहीं सीखता ...

स्त्री विशेष

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क्रांतिकारी जीवन और नारी आकर्षण हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में प्रगतिशील दृष्टिकोण के पक्षधर यशपाल का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है  । प्रेमचंदोत्तर उपन्यास कारों में अपनी विशिष्ट विचारधारा इमानदारी और सृजनात्मक शक्ति के कारण उन्होंने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाया है ।  यशपाल के उपन्यासों में उठाए गए प्रश्न प्रेमचंद के चिंतन का विकास और विस्तार है इनके चिंतन पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है ।  उनके स्त्री संबंधी विचार पर भी मार्क्सवादी चिंतन धारा की देन है ।  इनके साहित्य में सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह अपनी प्रत्येक रचना में बड़ी प्रचुरता के साथ सामाजिक प्रश्नों को उठाते हैं वह सामाजिक शोषण और अत्याचार के खिलाफ स्त्री मुक्ति के प्रश्न को बहुत आग्रह के साथ प्रस्तुत करते हैं । यशपाल ने अपने लेखन में रूढ़ियों अंधविश्वासों से मृत विचारों,  जड़ मान्यताओं ,  घातक धारणाओं का सदैव खुलकर विरोध किया है । स्वयं यशपाल और प्रकाशभारती को आर्य समाजी संस्कार ने इतना आगे बढ़ाया की बंदी जीवन में ही शादी करके उन्होंने समाज के लिए एक क्रांतिकारी ता का अद्भु...
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तू शोर है मेरा, मैं तेरी खामोशी मौनरूपी व्याख्या की महिमा प्रभावशाली होती है ।   उसके सामने क्या मातृभाषा क्या अन्य देश की भाषा सब को सब कुछ प्रतीत होती है । अन्य कोई भाषा दिव्य नहीं केवल व्याख्यान की मौनभाषा ईश्वरीय है । यदि विचार करके देखा जाए तो मौन व्याख्यान किस तरह हमारे हृदय की नाडी में  सुंदरता पिरो देता है ।  वह व्याख्यान ही क्या जिसमे हृदय की धुन को तथा बल के लक्ष्य को ना बदल दिया । चंद्रमा की मंद मंद हंसी का ,,, तारागणों  के कटाक्ष पूर्ण मौन व्याख्यान का प्रभाव ।  किसी कवि के दिल में घुस कर देखा ,,,, कमल और नरगिस में नयन देखने वालों से पूछो कि मौन व्याख्यान,,, की प्रभुता कितनी दिव्य है ,,, मौन की शक्ति की भावना पर आधारित है कि मौन तो ईश्वर प्रदत्त भाषा है ।  इससे आत्मिक गुणों का विकास तो होता ही है अपितु आत्मबल भी बढ़ता है । व्याख्यान व्यक्तित्व के निर्माण तथा विचारधारा को पुष्ट करने में अपनी महती भूमिका निभाता है । व्याख्यान अपने आप में अनेक भागों तथा सिद्धांतों को पिरोए हुए होता है ।  जिससे मानव के हृदय पर अनुकूल प्रभाव पड़े...

नारी: एक संकल्प

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नारी: एक संकल्प! 🌸 तुम्हारा स्त्री होना ही सबसे सुंदर है, यह कोई दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य की बात है कि तुम स्त्री हो... इस दुनिया में किसी के बिना कुछ खास नहीं बदलेगा पर तुम्हारे बिना दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं... गर्व करो कि तुम स्त्री हो.! “तुम मेरे हृदय की वो भावना हो  जिसे शब्दों में नहीं मूक संवाद में भी  व्यक्त नहीं किया जा सकता तुम तो  स्पंदन हो हृदय का देह का अर्धांग हो  अदृश्य-अनुभूति हो  जो अमर्त्य है सदा !!” सही बात. स्त्री के अनेक रूप होते हैं मां, बहन, बेटी लेकिन सबसे खूबसूरत होती है पत्नी, जिसमें हम सब रिश्तों की झलक देखते हैं। परन्तुनाजकल की स्त्रियों ने पत्नी को इतना बदनाम कर दिया कि कुछ बी से लोग बचते हैं, कभी अवैध संबंधों से, कभी 498 के नाम पर kabhi gharelu hinsa ke naam per. कुछ स्त्रियां जब तक मर्यादा में रहकर... सब कुछ सहती हैं बिना एक शब्द कहे तब तक वे उस घर परिवार की लक्ष्मी कहलाती हैं लेकिन जिस दिन वो अपने ऊपर हो रहे अत्याचार या दुराचार के खिलाफ बोलना शुरू कर दें गलत बातों का जवाब देना शुरू कर दे वो तब से कुल्टा,चरित्रहीन और स...

सती प्रथा

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सती प्रथा और सनातन का अपमान......... क्या, सती प्रथा सनातन धर्म की देन है? पोस्ट थोड़ी बड़ी है पर एक बार पढ़ना जरूर  कौआ और कोयल बेशक एक रंग के होते हैं। पर वसंत ऋतु आने पर दोनो का भेद खुल जाता है। जब कोयल मीठे स्वर में गाती है तो सब उसको पहचान ही जाते हैं। कुछ इतिहास कार, भारत मे हर समय बुराइयाँ ही ढूंढते रहते हैं, हर गलत बात को वो सनातन समाज की देन बता दिया करते हैं, आज इस पर ही विचार करेंगे. इन लोगों ने सती प्रथा को भी सदा हम लोगों और हमारे धर्म से जोड़ा है। ये जताने की कोशिस की है कि सनातनी लोग कितने खराब थे, जो नारियों को जिंदा पति के साथ जला दिया करते थे। सनातन धर्म के पुराने ग्रन्थों में इस प्रथा का कहीं भी कोई प्रमाण मुझे आज तक नही मिल पाया। सब से पहले आप रामायण काल को ही देख लें। जब महाराज दशरथ जी की मृत्यु हुई तो क्या तीनों माताएं उनके साथ सती हुई, वो तो एक आदर्श नारियाँ थी। इसका अर्थ ये हुआ कि ऐसी कोई प्रथा थी ही नही। गहि पद भरत मातु सब राखी। रही रानी दर्शन अभिलाषी।। क्या केवल माताएं अपने सती धर्म को छोड़कर भरत जी की बात मानकर सती होने से बची। ऐसा हो ही नहीं ...

वृषाली...स्त्री का त्याग..!!

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महाभारत की एक विस्मृत कथा ....कर्ण की पत्नी, वह स्त्री जिसे कभी चुना नहीं गया जब लोग कर्ण की बात करते हैं, तो वे उसके दुख, निष्ठा और भाग्य की चर्चा करते हैं। पर बहुत कम लोग उस स्त्री को याद करते हैं जिसने उसके जीवन को मौन होकर साझा किया उसकी पत्नी वृषाली। वह शक्ति के किसी महल में जन्मी नहीं थी। वह ऐसी रानी भी नहीं थी जो युद्धों की दिशा बदलती। फिर भी उसने महाभारत का सबसे भारी भाग्य अपने हृदय में उठाया। वृषाली कौन थी? वृषाली कर्ण की प्रथम और मुख्य पत्नी थी— सरल, शालीन और गरिमामयी। उसने कर्ण से विवाह तब किया जब वह अंग देश का राजा भी नहीं बना था, जब संसार उसे अब भी सूत-पुत्र कहकर अपमानित करता था। 👉 उसने किसी नायक से विवाह नहीं किया। 👉 उसने उस पुरुष से विवाह किया जिसे समाज ने ठुकरा दिया था। और उसने उसे कभी नहीं छोड़ा। वह अपमान जिसने सब कुछ बदल दिया द्रौपदी के स्वयंवर में कर्ण आगे बढ़ा। धनुष उठाने से पहले ही द्रौपदी ने उसे उसकी जाति के कारण सार्वजनिक रूप से अस्वीकार कर दिया। उस अपमान ने कर्ण के आत्मसम्मान को तोड़ दिया। पर जिसे लोग भूल जाते हैं, वह यह है—  • वह अपमान केवल कर...