स्त्री विशेष

क्रांतिकारी जीवन और नारी आकर्षण



हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में प्रगतिशील दृष्टिकोण के पक्षधर यशपाल का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है  । प्रेमचंदोत्तर उपन्यास कारों में अपनी विशिष्ट विचारधारा इमानदारी और सृजनात्मक शक्ति के कारण उन्होंने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाया है ।  यशपाल के उपन्यासों में उठाए गए प्रश्न प्रेमचंद के चिंतन का विकास और विस्तार है इनके चिंतन पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है ।  उनके स्त्री संबंधी विचार पर भी मार्क्सवादी चिंतन धारा की देन है ।  इनके साहित्य में सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह अपनी प्रत्येक रचना में बड़ी प्रचुरता के साथ सामाजिक प्रश्नों को उठाते हैं वह सामाजिक शोषण और अत्याचार के खिलाफ स्त्री मुक्ति के प्रश्न को बहुत आग्रह के साथ प्रस्तुत करते हैं ।



यशपाल ने अपने लेखन में रूढ़ियों अंधविश्वासों से मृत विचारों,  जड़ मान्यताओं ,  घातक धारणाओं का सदैव खुलकर विरोध किया है । स्वयं यशपाल और प्रकाशभारती को आर्य समाजी संस्कार ने इतना आगे बढ़ाया की बंदी जीवन में ही शादी करके उन्होंने समाज के लिए एक क्रांतिकारी ता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया । आर्य समाजी सीमाएं और संकीर्णता यशपाल की विकसित होती चेतना के बिल्कुल प्रतिकूल थी । साहित्यकार की सोच उनके व्यक्तित्व और विचार धारा के अनुकूल होती है ।  यशपाल का जो साहित्यिक व्यक्तित्व निखर कर सामने आया वह विद्रोही अधिक है । मार्क्सवादी होने के कारण यशपाल पूर्णता नास्तिक थे । ईश्वर और धर्म आदि पर उनका तनिक भी विश्वास नहीं था । यही कारण है कि ईश्वर और धर्म आदि के नाम पर होने वाले माननीय शोषण की उन्होंने खुलकर निंदा की । दकियानूसी विचारों , अंधविश्वास ,  रूढ़ियों से मुक्त यशपाल का व्यक्तित्व एक स्वतंत्र व्यक्तित्व था  जो एक आधुनिक दृष्टि और बौद्धिक मानस लिए हुए था मानव शोषण चाहे वह जैसा भी हो यशपाल उसके प्रति गहरा आक्रोश व्यक्त करते थे । वस्तुतः मार्क्सवादी विचारधारा का उनके साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा यशपाल को सब कुछ जीवन की अपनी शर्तों पर ही गहरी और स्वीकार्य है यही कारण है कि वह रूढ़ियों और जर्जर हो चुकी समाज व्यवस्था को गहरे आक्रोश और निर्ममता से तोड़ते दिखाई देते हैं । उनका मानना है कि यह धर्म और मर्यादा का जबरदस्त पाश ही है जो तथाकथित दुराचार और अनैतिकता का कारण है । वह विवाह सतीत्व एक निष्ठा प्रेम सदाचार आदि को पूंजीवादी व्यवस्था के सांस्कृतिक मूल्य मानते हैं । उनके उपन्यासों में इन सभी मूल्यों का खंडन हुआ है स्त्री मुक्ति संबंधी समस्या को वह मार्क्सवादी दृष्टि के अंतर्गत देखते हैं स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों को लेकर यशपाल को सबसे अधिक आलोचना का शिकार भी होना पड़ा यशपाल ने मध्यम वर्गीय आडंबर की धज्जियां उड़ाई है उतनी ही आत्मीयता से समाज के थे हुए जन समुदाय किसान ,  मजदूर , नारी , अछूत , वेश्याओं पतीताओ , या ठुकराई गई समस्त मनुष्यता को देखा है । उसी की आशाओं तथा संघर्षों को उभारा है यशपाल जी की कृतियों में योन ग्रंथियों का ही जलवा अधिक व्यक्त हुआ है । स्त्री पुरुष संबंध समाज की मान्यताएं उन्हें बहुत अखरती है इसलिए उन्होंने अपने उपन्यासों में स्त्री पुरुष के खुलकर यौन संबंध स्थापित करने की वकालत की है । यशपाल के साहित्य का उद्देश्य स्त्री शोषण के प्रति तथा स्त्री के स्वस्थ - सबल ,  स्वावलंबी हर प्रकार के शोषण से मुक्त करना है ।


जो 'दिव्या' के समूचे व्यक्तित्व एवं वाणी को औज़ और ऊर्जा देता है । वर्तमान समय में इसे नौकरीपेशा स्त्री की आत्मनिर्भरता में भी अनूदित किया जा सकता है ।  प्रश्रय में नारी के जीवन की सार्थकता क्या है । पुरुष द्वारा उसका भोग और उपभोग । जैसे पान की इच्छा होने पर पान दान की सार्थकता ।  उस प्रश्रय की इच्छा न करने पर ही नारी स्वतंत्र है ।  इसके अतिरिक्त 'झूठा सच' में तारा व कनक सहित दूसरे अन्य विस्थापित लड़कियां आर्थिक निर्भरता और ' मेरी तेरी उसकी बात ' में उषा व चित्र के रूप में अपनी पसंद ना पसंद का मुखर उद्घोष करती करती नई पीढ़ी की स्त्री वकालत करते हुए यशपाल ने स्त्रीवादी लेखन की प्रतिबद्धता को दर्ज करवाया है  स्त्री के निजी व्यक्तित्व के संबंध में यशपाल की यह मान्यता है कि स्त्री का स्वयं का व्यक्तित्व सामंती शोषण के प्रति विद्रोह करने की प्रेरणा देता है तथा वह पुरुष की संपत्ति बन कर जीवन यापन करने में अपना अपमान समझती है । इसका उदाहरण 'दादा कामरेड' की शेल है जो एक विद्रोही का रूप धारण कर जर्जर सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने में अधिक रुचि रखती है।  इस उपन्यास का उद्देश्य परिस्थितियों के अनुसार नैतिक धारणाओं को बदलने का है।  परंतु वास्तविक रूप में पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री कब भौतिक गुलामी से मानसिक रूप से गुलाम बन जाती है उसे स्वयं आभास भी नहीं होता ।  इस शोषणकारी व्यवस्था में यदि कोई स्त्री भूले से भी सतीत्व के स्थान पर अस्तित्व की मांग समाज से कर बैठती है या फिर अपनी सामाजिक व सांस्कृतिक राहे स्वयं निर्धारित करके वस्तु से प्राणी नहीं प्राणी से मनुष्य रूप में जीने की मांग करती है ,,,, तो उसे बेहया का खिताब या यह समाज देने में नहीं हिचकता । सच तो यह है कि लेखक की समग्र सहानुभूति त्रस्त नारी समाज को ही मिली है जिस तरह  'दिव्या ' उपन्यास में दिव्या परिस्थितियों के घात प्रतिघातो को सहती है उसी प्रकार 'झूठा सच 'में तारा भी सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका में डूबी उतरती है चुनौतियों को स्वीकार की है लेकिन अंत तक हार नहीं मानती । कारण यह है कि वह शिक्षित है एक शिक्षा का संबल ही उसे चेतना और शक्ति प्रदान करता है  । मनोरमा भी प्रेम की अधिकारी होने वाले व्यक्ति के लिए आत्मा निर्भरता को अनिवार्य मानती है सभी स्त्रियां आश्रय का मूल्य तथा प्रेम का मूल्य अपने शरीर से चुकाती है । आत्मतुष्ट प्रेम तो वही है जो मूल्य में आश्रय ना मांगे । प्रेम के मूल्य में जीवन भर आश्रय पा लिया या कुछ रुपए । प्रेम करने का अधिकारी वही है जो आश्रय ना मांगे जो अपने पांव पर खड़ा  हो वही वास्तविक प्रेम है यशपाल का यह मानना था कि स्त्री की वास्तविक मुक्ति केवल उसे घर से बाहर निकल कर नहीं हो सकती ।  जहां एक और तारा अपने अभिभावक द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह तय किए जाने पर आत्महत्या का प्रयास करती है वहीं कनक अपने निर्णय पर अटल रहकर विद्रोह करती है ।  'देशद्रोही' की चंदा डॉ खन्ना के प्रति सहानुभूति रखती है तेज बुखार और टांग की हड्डी टूट जाने के कारण हिल तक नहीं सकने वाले डॉ खन्ना की प्राणों की रक्षा की खातिर लोक लाज को दांव पर लगा व पुलिस से बचाने के प्रयत्न में मारी मारी फिरती चंदा को यशपाल ने चित्रित किया है । एक और चंदा अपनी लोक लाज को दांव पर लगाकर डॉ खन्ना को बचाने के यत्न कर रही थी वही उसकी पूर्व पत्नी (जो अब कांग्रेस नेता बद्री बाबू की पत्नी थी )बहू के रूप में अपनी पारिवारिक स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए उसे पनाह देने से इंकार कर देती है । इसके अतिरिक्त 'दादा कामरेड' की शैल पुरुष प्रधान समाज को अपनी चुनौती देती है । 'मेरी तेरी उसकी बात 'की उषा समाज समर्पित क्रांतिकारी व्यक्तित्व का महिमामंडन है जिसे उसके वैधव्य ने और भी प्रखर बनाया है । इसके अतिरिक्त 'दादा कामरेड ' में शैल की प्रेरणा से घर से बाहर निकलकर कांग्रेस के जलसे और जोलूसों में सक्रिय भागीदारी करके यशोदा ने सार्थकता और आत्मतोश पाया तो उससे उसका समूचे व्यक्तित्व भले ही स्वाभिमान की आभा से लिप्त हो गया हो परंतु वह पति अमरनाथ पर कहर बनकर टूट पड़ता है । यशपाल के उपन्यासों में स्त्री पात्र अपने जीवन परिस्थितियों से संघर्ष करती हुई अपनी शक्तियों से साक्षात्कार कर एक ऊर्ध्वमुखी व्यक्तित्व ग्रहण करती है । 'झूठा सच' में इन्होंने युगानुरूप अनेक आयामों को जोड़ा है । तारा विवाह पश्चात घरेलू हिंसा या लाइसेंस पा लेने वाले पति की नादिरशाही मनोवृति का तीव्र प्रतिकार करते हुए ललकार कर उठती है । कनक भी लोक लाज के नाम पर आत्म बलिदान करने की अनिवार्यता को झटक कर विवाह बंधन को तोड़ देने के कनक का ऐलान भी क्रांतिकारी हो जाता है । यशपाल के साहित्य का अधिकांश औरत के शोषण की बुनियादी समस्या से संबंध रखता है जो आज के ही नहीं आज के पहले के भी हर समय नारी जीवन की विकृतियों को संबंधित अनेक प्रश्न उधार देता है । कनक, तारा , शीलो सभी स्वाबलंबी है और पुरुष के समान अधिकार पाने के लिए प्रयत्नशील है । विवाह के प्रति यशपाल की अनास्था विवाह संस्था के बहिष्कार के रूप में हुई है  । 'मेरी तेरी उसकी बात ' के स्त्री पात्रों की चेतना में जड़े जमा चुकी है  । स्त्री विमर्श में यशपाल भारतीय परंपरागत स्वतंत्रता के समर्थक हैं जिससे वह पूर्ण सामाजिक जीवन व्यतीत करने की अधिकारी हो सके 'मनुष्य के रूप ' उपन्यास में भी नारी समस्या को व्यापक रूप से उठाया गया है  । सोना द्वारा परिस्थितियों के बदलने के कारण नारी के विभिन्न स्वरूपों का चित्रण अंकित किया है' मेरी तेरी उसकी बात ' में उषा एक क्रांतिकारी के रूप में उभरकर आती है सबसे पहला विद्रोही कदम माता पिता की धार्मिक और रूढ़ि ग्रस्त संकीर्णता के प्रति उठा और पति का चुनाव किया । लेकिन कुछ समय पश्चात पति में भी वही परंपरागत अधिकार भावना को देखा तो उसे सबसे ऊंचा राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त हुआ । परंपरा और प्रणति के छाया प्रकाश में उगी उषा यशपाल की अनूठी सृष्टि है वह नारी के बंधन और मुक्ति की दारुण न्याय कथा है । समाज धर्म और परंपराओं से परे उसमें शुद्ध मानवीय स्तर का राष्ट्रीय नारी व्यक्तित्व है यशपाल उषा के माध्यम से आधुनिक बुनियादी नारी के नए रूप को प्रतिष्ठित करते हैं ससुर को घुंघट काड कर परंपरागत रीति से चरण स्पर्श करते हुए प्रसन्न करने में उसे कितना नाटकीय आयास करना पड़ा इस प्रकार परंपरा के आगे सिर झुकाते और संतुष्ट होते देख कर स्वयं अपने भीतर स्वतंत्र व्यक्तित्व की तड़पन पैदा होती है और वह पति नामक संस्था की जकड़न से मुक्त होकर राष्ट्रीय व्यक्तित्व को निखार देती है । इसमें उषा के पूर्ण नारीत्व का अंतिम गुणात्मक अध्याय जुड़ता है यशपाल ने जिसे अत्यंत मार्मिक ढंग से किया है । यदि नारी पराजित भी होती है तो अपने वात्सल्य से । यशपाल ने अपने सभी उपन्यासों में नारी की स्थिति पर ध्यान आकर्षित किया है कनक और तारा के समान ही दिव्य में भी बौद्ध युगीन पृष्ठभूमि में युगांतर से दलित पीड़ित नारी की करुण कथा तथा प्रगतिशील दृष्टिकोण के आधार पर नारी जीवन की सार्थकता को परिभाषित किया है दिव्या का सारा संघर्ष अपने मानवीय अस्मिता की तलाश है  । नारी का कुल क्या उसे भोगने वाले पुरुष के कुल से ,,,, ??  नारी का कुल होता है ,,,,??? 'दिव्या 'का नहीं स्वयं यशपाल का भी मोह भंग हुआ है जो 'झूठा सच 'की तारा के जरिए पुरुष पशुओं से दूर जाने की इच्छा में अभिव्यक्ति पाता है यशपाल किसी ना किसी बहाने से समूचे चेतन समाज और स्वतंत्रता स्त्रियों की निष्क्रिय भूमिका पर तीखा व्यंग करते हैं जब तक स्त्रियां और किसी योग्य नहीं हो पाती तब तक अपना सम्मोहन उन्हें इसी प्रकार रिझाकर पुचकार कर बनाए रखना चाहिए । इसके अतिरिक्त कभी घर से बाहर की दुनिया में कदम रखने वाली यशोदा को एक सुलझे हुए चिंतक एवं संवेदनशील व्यक्ति के रूप में जब वे शैल के वेष में ढाँढस बढ़ाते हैं ।  यशपाल का मानना है कि स्त्री यदि आर्थिक तौर पर स्वतंत्र होगी तो स्त्री पुरुषों में समानता आएगी । लेकिन आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करके भी यदि स्त्री पुरुष को छोड़ने और उन से जुड़ने में ही मुक्ति देखें तो यह छिछली स्वतंत्रता होगी । नारी ने घर में रहकर पारिवारिक एवं सामाजिक रूढ़ियों के प्रति अपना विरोध प्रदर्शित किया । बाहर पहुंचकर सार्वजनिक क्षेत्र में नारी अपनी प्रतिभा का समुचित विकास कर सकती है । यशपाल स्त्रियों को स्वतंत्र ही नहीं आर्थिक आत्मनिर्भर के रूप में देखना चाहते हैं 'दादा कामरेड' की यशोदा भी शैल के व्यवहार व व्यक्तित्व से आकर्षित हो सार्वजनिक जीवन में पदार्पण करती है । पति रूप में की विरक्ति भी सहनी पड़ती है  । घर तथा परिवार के बाहर अपने व्यक्तित्व को संवारती स्त्रियों के चरित्रों को यशपाल ने बहुत ही यथार्थ रूप में चित्रित किया है । देशद्रोही की राज जो अपने पति डॉ खन्ना की मृत्यु का समाचार आते ही निष्प्राण हो जाती है उसके जीवन की आंच जैसे बुझने लगती है । परंतु बद्री बाबू के सहयोग से वह समाज सेविका बन जाती है लेकिन उसे घर की उपेक्षा करने पर घर में रहने का स्थान नहीं रहा । बेलाग भाषा बोलने वाली स्त्री यशपाल के विचारों की स्त्री है कनक  , तारा ,शीलो , शेल सभी स्त्री पात्र समाज के नियंत्रित व्यवहार का निषेध करती है । वह सभी बेबाक अपने अधिकारों की बात करती है । यशपाल ने बहुत ही साहस पूर्ण ढंग से अलग होकर अपनी रचनाओं में स्त्री प्रश्नों को जगह दी है ।

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