जिन्दगी के आखरी पहर में,,

अगर मिलना लिखा होगा,
तो हम
किसी मोड़ पर नहीं,
किसी सुकून में मिलेंगे।
जहाँ
न दुनिया होगी,
न उसकी आवाज़।
सिर्फ़ इतना होगा
कि
दो लोग,
जिन्होंने बहुत कुछ खोया,
आख़िरकार
एक-दूसरे को पा लेंगे।

चलिए ,,,,
वहां जहां झरने हो चहचहाहट 
चिड़ियों की हो कोयल की आवाज हो 
पेड़ पौधे की आवाज हो 
सरसराहट हो 
और एक हाथों से बनाई कुटिया हो 
हम और आप हो बस

बहुत रोई हैं आँखें 
इस मतलबी शहर में,
अब ठहरना है मुझे बस तुम्हारी लहर में।
जो खोया है हमने, 
वो क़िस्मत का खेल था,
अब पाना है तुमको ज़िंदगी के आख़िरी पहर में।

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