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स्त्री

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हिंदी साहित्य में ‘स्त्री विमर्श’ पहली बात तो किसी भी भाषा का कोई भी बड़ा विमर्श दो-चार लेखकों के दम पर लम्बे समय तक नहीं चलता है और दूसरी बात कि वह किसी एक ही धारा में विकसित नहीं होता है| यदि किसी साहित्यिक विमर्श का मूल्यांकन दो-चार लेखकों को आधार बना कर किया जाये और निष्कर्ष भी दे दिया जाये तो यह साहित्य के साथ ही साथ उस विमर्श के भी बड़े परिप्रेक्ष्य की उपेक्षा है| हिंदी साहित्य में भी स्त्री विमर्श कई धाराओं में विकसित हुआ और उसका मूल कारण लेखिकाओं का अपना अनुभव जगत और अपनी अलग-अलग सामाजिक स्थिति है| जिस ‘मर्दवाद’ के खिलाफ स्त्री विमर्श खड़ा हुआ है उसकी प्रतिक्रिया में ‘स्त्रीवाद’ का वह रूप भी आता है जहाँ वह मर्दवादी अवधारणा पर ही खड़ा दिखाई देता है लेकिन ऐसी प्रतिक्रिया पश्चिम के स्त्री विमर्श का भी हिस्सा रही है| ऐसी प्रतिक्रियावादी धारा किसी भी विमर्श को दिग्भ्रमित कर सकती है खासतौर पर उसके सामाजिक उत्तरदायित्वों की दिशा को, इसलिए इस मुद्दे पर खुल कर बहस और आलोचना होनी चाहिए लेकिन इसे मूल्यांकन की कसौटी नहीं मान लेनी चाहिए|

8मार्च

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विधाता की सबसे सुन्दर , कृति हो तुम......! उस पर तुम्हारी हंसी दुनिया की सबसे सुन्दर कला.....! तुम्हारा हंसना जैसे नदी की कलकल पहाडों से जमीं पर लहराते आता झरना....! सांवली कलाइयों में गुलाबी चूड़ियों का बजना  जैसे कोयल का कुहकुहाना....! तूम बिन्दिया ज़रूर लगाया करो तुम्हारे सांवले-सलोने..... गोल से चेहरे पे......! गोल, बड़ी सी बिन्दिया  बहुत खिलती है तुम्हारे मृगनयनी सांवले चेहरे पर...! आज आसमान पे..... चाँद देख कर तुम्हारी याद आयी..! रात के सांवले चेहरे पे  गोल बड़ी बिन्दिया सा चाँद  सचमुच......बहुत खिलता है....! उम्र की कमाई है मेरे तुम्हारी उजली पाक हंसी.......! क़तरा क़तरा ख़त्म होती  क़त्ल होती  जमाने को दिखानेवाली तुम्हारी खोखली हंसी........!!!!!! 🌹🌹🌹🌹🌹

औरत

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एक औरत का जन्म                                     कितनी बार होता है एक जन्म,उसे अपनो मां से मिलता है जिसकी आयु विवाह तक रहती फिर एक नया जन्म  नया घर नये लोग नई दुनियां                        फिर एक जन्म लेती है  जब वो जन्म देती है जितनी बार जन्म देती है                              उतनी बार जन्म लेती है लेकिन मरती कितनी बार है                          जन्म लेने से लेकर देह छोड़ देने के बीच अपनी अपेक्षाओं में मरती                            उपेक्षाओं  पे मरती  हर त्याग के बाद  मरती हर समर्पण के पहले मरती                          ...

स्त्री

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स् त्री के लिए प्रेम का मतलब होता है सब कुछ मिला कर एक ही में केंद्रित कर देना फिर स्त्री की हर बात, हर सोच, हर चाह उसी एक केंद्र के चारों तरफ़ घूमती रहती है । शायर स्त्री को शमा और पुरुष को परवाना कहते हैं लेकिन सच्चाई तो यह है स्त्री ही परवाना है वो जिसे प्रेम करती है उसी में समा जाना चाहती है चाहे उसका ख़ुद का अस्तित्व ही क्यों ना ख़त्म हो जाए वो उसी के अस्तित्व में मिल जाना चाहती है । स्त्री का प्रेम बहुत हद तक मान, अपमान, अपेक्षा, उपेक्षा से परे होता है उसका क्रोध उसकी चिड़चिड़ाहट भी तभी प्रकट होती है जब उसे प्रेम के बदले प्रेम ना मिले वो कम प्रेम में ख़ुश रह सकती है लेकिन उसे प्रेम के बदले प्रेम चाहिए । स्त्री तब तक सब कुछ सहन कर लेती है जब तक उसे विश्वास हो की वो जिसे चाहती है वो भी उसे ही प्रेम करता है जो स्त्री परस्पर प्रेम में होती है वो एक गहरी नींद में होती है और सब कुछ स्वप्न होता है वो इसी स्वप्न में रहना चाहती हमेशा हमेशा के लिए । वो जिसे चाहती है सिर्फ़ उसी के साथ मारते दम तक उसी की हो कर रहना चाहती है । और पुरुष के लिए प्रेम का मतलब है इकछाओं का ढेर, उसी ढेर में क...

Happy women's Day

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एक शादी_शुदा स्त्री, जब किसी पुरूष से मिलती है... उसे जाने अनजाने मे अपना दोस्त बनाती है.... तो वो जानती है की न तो वो उसकी हो सकती है.... और न ही वो उसका हो सकता है.... वो उसे पा भी नही सकती और खोना भी नही चाहती.. फिर भी वह इस रिश्ते को वो अपने मन की चुनी डोर से बांध लेती है.... तो क्या वो इस समाज के नियमो को नही मानती? क्या वो अपने सीमा की दहलीज को नही जानती? जी नहीं....!! वो समाज के नियमो को भी मानती है.... और अपने सीमा की दहलीज को भी जानती है... मगर कुछ पल के लिए वो अपनी जिम्मेदारी भूल जाना चाहती है...!! कुछ खट्टा... कुछ मीठा.... आपस मे बांटना चाहती है .. जो शायद कही और किसी के पास नही बांटा जा सकता है... वो उस शख्स से कुछ एहसास बांटना चाहती है... जो उसके मन के भीतर ही रह गए है कई सालों से... थोडा हँसना चाहती है... खिलखिलाना चाहती हैं... वो चाहती है की कोई उसे भी समझे बिन कहे... सारा दिन सबकी फिक्र करने वाली स्त्री चाहती है की कोई उसकी भी फिक्र करे... वो बस अपने मन की बात कहना चाहती है... जो रिश्तो और जिम्मेदारी की डोर से आजाद हो... कुछ पल बिताना चाहत...

चरित्रहीन कोन ,,,,,??

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#औरत_कभी_चरित्रहीन_नही_होती औरत के चरित्रहीन होने से पहले पुरुष अपना चरित्र खोता है ! औरतों को नीचा दिखाने का सबसे सरल और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीक़ा है कि उसे वेश्या, कैरेक्टरलेस कह दिया जाये, या उसे अपने किसी गलत तरीके से उसकी तरफ इशारा किया जायें। ये बात और है कि हमारा समाज इस बात पर कभी ध्यान नहीं देता कि वो वेश्या अकेले कैसे बन जाएगी ? उसको वेश्या बनाने में किसी पुरुष का होना बेहद ज़रूरी है। जब एक स्त्री नंगी होती है, देह बेचने के लिए, तो पुरुष अपने कपड़े पहले ही उतार चुका होता है। वेश्या की ईमानदारी तो है कि वो एक जगह पर वेश्या है, लेकिन पुरुष का क्या जो अपने घर की दहलीज़ पर अपने तथाकथित चरित्र को त्याग कर किसी वेश्या के वक्षस्थल पर अपने हाथ फिराने आता है ? उस पुरुष को वेश्या कहने में संकोच कैसा ? तुम्हें अपने हिस्से का आनंद भी चाहिए, तुम्हें विवाह से बाहर किसी दूसरी स्त्री के साथ सेक्स भी चाहिए और चाहिए चरित्र भी। वाह ! और वहाँ से निकलते हुए, या उसी बिस्तर पर नग्नावस्था में, तुम उसे वेश्या कहकर गाली देने से भी नहीं हिचकते। जबकि वेश्या तो असल में तुम हो, वो तो अ...

ढाई अक्षर

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मुझे ठीक से याद नहीं है कि मैने कब पढा था *पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय *ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय* अब पता लगा ये ढाई अक्षर क्या है- ढाई अक्षर के ब्रह्मा और ढाई अक्षर की सृष्टि। ढाई अक्षर के विष्णु और ढाई अक्षर की लक्ष्मी। ढाई अक्षर के कृष्ण ढाई अक्षर की दुर्गा और ढाई अक्षर की शक्ति। ढाई अक्षर की श्रद्धा और ढाई अक्षर की भक्ति। ढाई अक्षर का त्याग और ढाई अक्षर का ध्यान। ढाई अक्षर की तुष्टि और ढाई अक्षर की इच्छा। ढाई अक्षर का धर्म और ढाई अक्षर का कर्म। ढाई अक्षर का भाग्य और ढाई अक्षर की व्यथा। ढाई अक्षर का ग्रन्थ, और ढाई अक्षर का सन्त। ढाई अक्षर का शब्द और ढाई अक्षर का अर्थ। ढाई अक्षर का सत्य और ढाई अक्षर की मिथ्या। ढाई अक्षर की श्रुति और ढाई अक्षर की ध्वनि। ढाई अक्षर की अग्नि और ढाई अक्षर का कुण्ड। ढाई अक्षर का मन्त्र और ढाई अक्षर का यन्त्र। ढाई अक्षर की श्वांस और ढाई अक्षर के प्राण। ढाई अक्षर का जन्म ढाई अक्षर की मृत्यु। ढाई अक्षर की अस्थि और ढाई अक्षर की अर्थी। ढाई अक्षर का प्यार और ढाई अक्षर का युद्ध। ढाई अक्षर का प्रेम और ढाई...