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कहावत का चमत्कार

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* ये चमत्कार हिंदी में ही हो सकता है …* *चार मिले चौंसठ खिले, बीस रहे कर जोड़!* *प्रेमी सज्जन दो मिले, खिल गए सात करोड़!!* मुझसे एक बुजुर्गवार ने इस कहावत का अर्थ पूछा.... काफी सोच-विचार के बाद भी जब मैं बता नहीं पायी, तो मैंने कहा – "बाबा आप ही बताइए, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा !" तब एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बाबा समझाने लगे – "देखो बेटी, यह बड़े रहस्य की बात है... चार मिले – मतलब जब भी कोई मिलता है, तो सबसे पहले आपस में दोनों की आंखें मिलती हैं, इसलिए कहा, चार मिले ! फिर कहा, चौसठ खिले – यानि दोनों के बत्तीस-बत्तीस दांत – कुल मिलाकर चौंसठ हो गए, इस तरह “चार मिले, चौंसठ खिले” हुआ!" “बीस रहे कर जोड़” – दोनों हाथों की दस उंगलियां – दोनों व्यक्तियों की 20 हुईं – बीसों मिलकर ही एक-दूसरे को प्रणाम की मुद्रा में हाथ बरबस उठ ही जाते हैं!" “प्रेमी सज्जन दो मिले” – जब दो आत्मीय जन मिलें – यह बड़े रहस्य की बात है – क्योंकि मिलने वालों में आत्मीयता नहीं हुई तो “न बीस रहे कर जोड़” होगा और न "चौंसठ खिलेंगे” उन्होंने आगे कहा, "वैसे तो शरीर में रोम की गि...

स्त्री

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स्त्री तो अनादि काल से ही मानव ह्रदय की राग आत्मक व्रतियों की प्रेरणा स्त्रोत रही है ।   द्विवेदी जी ने स्त्री पक्ष का समर्थन करते हुए कहा है कि --- "पति को देवतुल्य हम माने , बच्चों की भी दासी है , सेवा सदा करे नहीं सोचे , भूखी हो या प्यासी हे भगवान हाय तिस पर भी उपमा कैसे आती है ढोल - तुल्य ताड़न अधिकारी हम बनाई जाती हैं ।"  इस प्रकार स्त्री की उच्च भावना का विकास इन पंक्तियों में देखा जा सकता है । आधुनिक स्त्री ने स्वयं के महत्व को प्रतिष्ठित किया है । स्त्री में स्वाभिमान और आत्म समर्पण की भावना अत्यधिक होती है उसे आप अपने अधिकारों की चिंता है क्योंकि वह अब शिक्षित है स्त्रियों ने आज विभिन्न क्षेत्रों में सफलतापूर्वक प्रवेश किया है  शिक्षक , डॉक्टर , वकील और प्रशासक के रूप में स्त्री ने अपनी प्रभावी भूमिका भी निभाई है । यह सिद्ध सत्य है कि यदि माता शिक्षित नहीं होगी तो देश की संतानों का कदापि कल्याण नहीं हो सकता बालक का प्रारंभिक ज्ञान ही पत्थर पर बनी अमित लकीर के समान होता है जो एक माता अपनी संतान को देती है ।  लेकिन वर्तमान समय में कुछ असामाज...

स्त्री

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"विशेल कामदर्तो व गुणरवा परिवाजित : उपचय: स्त्रियासाधव्या सतत देववत पति : " तात्पर्य पति चाहे शील रहित हो ,काम पूर्ण हो या अवगुण युक्त हो , कैसा भी क्यों ना हो स्त्री के द्वारा उसकी सेवा सदा देवता तुल्य होनी चाहिए । कुछ सवाल हम सभी को सोचने पर विवश कर देते हैं ----- क्या स्त्री का धर्म अधिकारी पुरुष अधिकृत पत्नी बन कर रहना है ,,?? क्या सारे नियम बंधन स्त्री के लिए ही है ,,,?? क्या पुरुष परम स्वतंत्र है ,,,?? क्या सारे समाज में पुरुष के आना चार को अनदेखा किया जाता है ,,,?? क्या स्त्री को ही सब कुछ सहन करना होता है,,,?? परिवार में बच्चे पैदा करने से लेकर बच्चों की पढ़ाई तथा उसके शादी ब्याह जैसे निर्णय लेने का अधिकार स्त्री को नहीं होता इस प्रकार स्त्री दोहरे दर्जे की जिंदगी व्यतीत करती है । हिंदी में स्त्री विमर्श एक वैश्विक विचारधारा है लेकिन विडंबना यही है कि हिंदी में जो स्त्री विमर्श चल रहा है उसका इस वैश्विक विचारधारा से बहुत कम लेना देना है या नहीं के बराबर है । हिंदी में जो भी स्त्री विमर्श है उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह सिर्फ साहित्यिक दायरे तक सिमटा...

भारतीय संस्कृति

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  मेरे बच्चों को मुझसे और मुझे अपनी मां से सख्त शिकायत है  कि--- हमें झूठ बोलना नहीं सिखाया  दुनियादारी नहीं बनाया इसलिए  वह जहां भी जाते हैं स्वयं को अकेला पाते हैं  जरा सा भी असत्य का दामन थामने की कोशिश में  पसीना पसीना हो जाते हैं । किसी भी राष्ट्र को नष्ट करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि वहां की शिक्षा संस्कृति और इतिहास को विकृत कर दिया जाए और जनसामान्य में हीनता एवं अपराध बोध का भाव उत्पन्न कर दिया जाए जिससे वहां की संस्कृति की जड़ें क्रमशः सूखती चली जाएंगी और वह राष्ट्र विनाश को प्राप्त हो जाएगा । भारतीय संस्कृति के साथ भी यह सब बहुत समय से चल रहा है किंतु यहां की संस्कृति की जड़ें जमीन की अनंत गहराइयों में है जिसके कारण आज भी अपने स्वरूप को बरकरार रखने में सक्षम है हालांकि पश्चिम एवं अरब से आने वाले बर्बर आतंकी लुटेरों ने चाहे वे मुगल शासक हो अथवा अंग्रेज हो वे किसी भी रूप में हो उन सभी ने हमारे यहां के शिक्षण संस्थानों जैसे नालंदा तथा तक्षशिला जैसे वैश्विक शिक्षा के इन संस्थानों को नष्ट किया है ।  हमारे इतिहास को वितरित करने के पीछे इन सभी ...

स्त्री

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  सामाजिक क्षेत्र में जितनी भी समस्याएं जन्म लेती है ,,,उनका संबंध अधिकतर स्त्री जाति से ही होता है । इन विविध समस्याओं और कुप्रथा ने नारी जाति को बड़ी हीनवस्था में पहुंचा दिया है । पर्दा प्रथा के कारण नारी जाति घर में बंदिनी बना दी गई है । दहेज की समस्या ने पुत्री के जन्म को भी अप्रिय बना दिया है । बाल विवाह से ,,, विधवा समस्या और वेश्या समस्याओं का जन्म हुआ । पुरुष की स्थिति पर इन समस्याओं का उतना भीषण प्रभाव कभी नहीं पड़ा जितना स्त्री पर पड़ा । स्त्री की समाज में दयनीय स्थिति का कारण जहां उसका स्त्री होना है वहां इन समस्याओं के अभिशापो का उस पर लाद देना भी है । मेरा उद्देश्य समाज की मान्यताओं को यह खोखले पन को छोड़कर सामने रखना रहा है मैं अपने इस शैली के माध्यम से सामाजिक जीवन के जिन शब्दों को रेखांकित करना चाहती हूं उस पर बहुत से आलोचकों को भ्रम उत्पन्न हो जाता है ।आज की स्त्री के समक्ष   पतिवत की समस्या के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वाधीनता का प्रश्न भी खड़ा है । वर्तमान समय में स्त्री स्वयं के परिश्रम प्रतिभा व्यवहार कुशलता सहिष्णुता साहस और दृढ़ता आदि के गुणों के सहारे ना...

कड़वा शब्द

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कभी कभी मैं सोचती हूँ कि पुरुषों के लिए यह समझना कितना मुश्किल रहा है सदा से ही ।  सत्य है पुरूष  कभी भी उस स्त्री के दुख का सहभागी नहीं बन सकता जो स्त्री सिर्फ पत्नी बनी ,, प्रेमिका नहीं ,, ।यह जानने के बाद भी उनके पति उनसे कभी प्रेम किए ही नहीं या कर भी नहीं पाएंगे ।  कैसे रह लेती है उनके साथ ।  कैसे सो लेती है उनके बिस्तर में ,,,???  क्या सिर्फ सिर पर एक छत और खाने को भरपेट मिल रहा ,,,यही काफी होता है  ??? अपनी इच्छाएं अपनी आकांक्षाएं नहीं होती ,,,,??? उनका पति पैसा कमा कर दे रहा है और वह घर चला ले रही है ।  इतना ही बहुत है क्या ,,,,, ?? बच्चों को पाल रही उनको पढ़ा रही ,,,, घर को सजा रही ,,,, इससे ज्यादा उन्हें नहीं चाहिए क्या ,,,,, ?? क्या एक स्त्री का पत्नी हो जाना खुद को भूल जाना होता है ,,, ???? स्त्री प्रकृति की सुंदरता व सर्वश्रेष्ठ रचना है । कोई भी पुरुष बिना स्त्री के सहयोग के सफल नहीं हो सकता चाहे वह पत्नी रूप हो या मां के रूप में ।  वह स्त्री है  खिलौना नहीं  वह नारी है  उसके पर काटना नहीं  क...

स्त्री प्रश्न

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                           ---------------- परिवर्तन के इस दौर में जब सब कुछ बदल रहा है तो पुरुष भी बदले और स्त्री भी ।  लेकिन पुरुष ने खुद को स्त्री की तरह नहीं बनाया । वह पुरुष ही बना रहा लेकिन अजीब बात यह हो गई कि स्त्री या पुरुष बन गई ।  वह पूर्ण रूप से पुरुष हो जाना चाहती है या यूं कहें कि हो गई है पुरुष की तरह पहनावा चाल चलन और सोच भी । स्त्री पुरुष के बीच समानता स्थापित करने का दावा विभिन्न आंदोलन करते है । एक आंदोलन स्त्री पुरुष समानता स्थापित करने के उद्देश्य से स्त्रियों को धूम्रपान को बढ़ावा देने की बात भी करता था । इस आंदोलन का मानना था कि ऐसा करने से उस सामाजिक निषेध का प्रतिकार होगा । जहां सिगरेट पीना पुरुषों के लिए ठीक पर स्त्रियों के लिए बुरा माना जाता था ।  स्त्रियां हाथ में जलती सिगरेट लेकर जुलूस निकालती थी और इसे 'अधिकारों की मशाल' भी कहा गया । अब इस मशाल से स्त्रियों की दुनिया जगमगाई थी या उनकी देह जली । इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है मगर यह तथ्य समूचे आंदोलन को सवालो...