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कड़वा शब्द

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कभी कभी मैं सोचती हूँ कि पुरुषों के लिए यह समझना कितना मुश्किल रहा है सदा से ही ।  सत्य है पुरूष  कभी भी उस स्त्री के दुख का सहभागी नहीं बन सकता जो स्त्री सिर्फ पत्नी बनी ,, प्रेमिका नहीं ,, ।यह जानने के बाद भी उनके पति उनसे कभी प्रेम किए ही नहीं या कर भी नहीं पाएंगे ।  कैसे रह लेती है उनके साथ ।  कैसे सो लेती है उनके बिस्तर में ,,,???  क्या सिर्फ सिर पर एक छत और खाने को भरपेट मिल रहा ,,,यही काफी होता है  ??? अपनी इच्छाएं अपनी आकांक्षाएं नहीं होती ,,,,??? उनका पति पैसा कमा कर दे रहा है और वह घर चला ले रही है ।  इतना ही बहुत है क्या ,,,,, ?? बच्चों को पाल रही उनको पढ़ा रही ,,,, घर को सजा रही ,,,, इससे ज्यादा उन्हें नहीं चाहिए क्या ,,,,, ?? क्या एक स्त्री का पत्नी हो जाना खुद को भूल जाना होता है ,,, ???? स्त्री प्रकृति की सुंदरता व सर्वश्रेष्ठ रचना है । कोई भी पुरुष बिना स्त्री के सहयोग के सफल नहीं हो सकता चाहे वह पत्नी रूप हो या मां के रूप में ।  वह स्त्री है  खिलौना नहीं  वह नारी है  उसके पर काटना नहीं  क...

स्त्री प्रश्न

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                           ---------------- परिवर्तन के इस दौर में जब सब कुछ बदल रहा है तो पुरुष भी बदले और स्त्री भी ।  लेकिन पुरुष ने खुद को स्त्री की तरह नहीं बनाया । वह पुरुष ही बना रहा लेकिन अजीब बात यह हो गई कि स्त्री या पुरुष बन गई ।  वह पूर्ण रूप से पुरुष हो जाना चाहती है या यूं कहें कि हो गई है पुरुष की तरह पहनावा चाल चलन और सोच भी । स्त्री पुरुष के बीच समानता स्थापित करने का दावा विभिन्न आंदोलन करते है । एक आंदोलन स्त्री पुरुष समानता स्थापित करने के उद्देश्य से स्त्रियों को धूम्रपान को बढ़ावा देने की बात भी करता था । इस आंदोलन का मानना था कि ऐसा करने से उस सामाजिक निषेध का प्रतिकार होगा । जहां सिगरेट पीना पुरुषों के लिए ठीक पर स्त्रियों के लिए बुरा माना जाता था ।  स्त्रियां हाथ में जलती सिगरेट लेकर जुलूस निकालती थी और इसे 'अधिकारों की मशाल' भी कहा गया । अब इस मशाल से स्त्रियों की दुनिया जगमगाई थी या उनकी देह जली । इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है मगर यह तथ्य समूचे आंदोलन को सवालो...

* माँ *

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                       ----------//---------- पूजा उपासना हमें अंतर्मुखी बनाती है यह हमें आंतरिक शक्ति प्रदान करती है।  खंड खंड बटे हमारे चरित्र को अखंडता प्रदान करती है । आराधना करने की शक्ति ,, अंतमुर्खी होने की क्षमता केवल मनुष्य में है ,, पशु में नहीं  । मातृ उपासना सभी उपासना में श्रेष्ठतम है और अमोघ फल प्रदान करने वाली है । ईश्वर की भक्ति से जहां केवल ज्ञान और वैराग्य मिलता है वहां माता की उपासना से लोक परलोक दोनों प्राप्त होते हैं  । राजा निर्दयी हो सकता है ,,  मित्र धोखा दे सकता है ,,, प्रियतम मुँह मोड सकता है ,,, पिता त्याग कर सकता है ,,,,  परंतु माता अपनी संतान के प्रति निष्ठुर नहीं हो सकती ।। मातृ उपासना में करना धरना कुछ नहीं पड़ता केवल उसके आश्रय में बैठ जाना भर होता है  । सभी शास्त्र वेद और ज्ञान के अंग उपांग सृष्टि की रचना पर अपने-अपने ढंग से विचार करते हैं और सृष्टि के प्रथम शब्द की चर्चा में अपने-अपने मत भी प्रकट करते हैं  ।  संतों की अवधारणा है कि पहला शब्...

: स्त्री :

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              ------- ------                                                                             तत्सृष्टसृष्ट सृष्टेशु कोनवखइतधीपुमान । ऋषि नारायणमते योशिनमय्येया मायया ।। बलं मेपश्य मायाया : स्त्रिमयया जयिनोदिशाम । या करोति पदक्रन भुविज्ञभ्रंन केवलम ।।               भागवत -- 3/31/37-38 भागवत में अनेक रूपों में स्त्री को माया रूपा कहा गया है ।जिससे ऋषि नारायण के अतिरिक्त सभी पुरूषों की बुद्धि मोहित रहती हैं । इतना ही नहीं वह निज भ्रुविलास मात्र से बड़े बड़े दिग्विजय वीरो को पैरों से कुचल दिया करती है । अथार्त देवमाया रूपिणी स्त्री के बाहुपाश में आबद्ध होकर जीव विवेकहीन हो जाता है ओर अधोगति को प्राप्त करता है । इस प्रकार भगवतकार के अनुसार स्त्री देवताओं की वह माया है जिससे जीव मोक्ष प्राप्ति या भगवत्प्राप्ति...

कर्म / भाग्य

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-------- --------- पैर मिले हैं ,,, चलने को तो पांव पसारे मत बैठ,,,  आगे आगे चलना है तो हिम्मत हारे मत बैठ ,,,, कहा गया है कि जीवन में बिना कर्म के कुछ नहीं मिल सकता । लेकिन इस दुनिया में कर्म को मानने वाले लोग कहते हैं कि भाग्य कुछ नहीं होता और भाग्यवादी का मानना यह है कि जो कुछ लिखा होगा वही होगा । गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ----- " कठिन करम गति जान विधाता जो शुभ अशुभ शक्ल फल दाता । " भाग्य को चमकाने के लिए इंसान न जाने कितने तरीके और उपाय करता है ।लेकिन वह वास्तविक रूप में अपना भाग्य चमकाना है तो सबसे पहले अपने आप से अच्छा व्यवहार करें और खुद का सम्मान करें अच्छा पाने के लिए अच्छा करना भी पड़ता है बुरे के साथ कभी अच्छा नहीं होता कहते हैं ना कि --- " बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाए ।" चाणक्य नीति  कहती है कि ----  " मनुष्य अपने कर्मों से महान होता है अपने जन्म से नहीं " किसी विद्वान ने तो सफलता की परिभाषा को ही बदलते हुए कह दिया है कि --- सफलता जीवन में मिले आपके पास शोहरत और धन दौलत से निश्चित नहीं होती बल्कि आपके जीवन...

स्त्री की आज़ादी -- उसके *पर्स * में ही है ,,,,

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------- ** ------ एक ही अंतहीन क्षितिज कक्ष में में जी रही हूं  --- और वह क्षण जरा भी नहीं बदलता टस से मस नहीं होता ।  मैं मानो एक काल निरपेक्ष क्षण में टंगी हुई हूं --- वह क्षण काल की लड़ी में से टूट कर कहीं छिटक गया है और इस तरह अंतहीन हो गया है ---- अंतहीन और अर्थहीन ।            *अपने - अपने अजनबी* किताबों की दुनिया एक अलग दुनिया होती है जो हमें स्वतंत्र और स्वायत्त बनाती है । मेरा मानना है कि हमारे सभी सवालों का जवाब हमें यही मिल सकता है इस किताबी दुनिया के बीच । स्त्री प्रश्न या स्त्री मुक्ति प्रश्न बहुत बड़ा है । इसे मनुष्यता को अवश्य ही सुलझाना होगा । स्त्रियों को बड़े से बड़े दुख सहने की आदि काल से ही आदत है । यही कारण है कि किसी अपवाद को यदि छोड़ दिया जाए तो स्त्रियों में हृदयाघात से मौत नहीं होती क्योंकि वह जीवन भर ही तो आघात सहन करती रहती है और दूसरों को सदा सुख देती रहती है । ऐसे में उनका ह्रदय जो प्रकृति से कोमल होते हुए भी इतना अत्यधिक कठोर हो चुका होता है कि वह बड़े से बड़े आघात को सहने में स्वत ही सक्षम ह...

** तुलसी के राम **

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               **तुलसी के राम** तुलसीदास के राम उस जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं ।  जो अपने आत्म बल के बूते पर आंतरिक स्थितियों से सामंजस्य बैठाती हुई अन्याय और असत्य के संघर्ष को न्याय और सत्य से झेलती है ।  इनका एक ही लक्ष्य है - सत्य और एक ही अस्त्र है - विवेक ।  तुलसीदास के राम केवल अन्याय के प्रतिरोदार्थ अस्त्र उठाते हैं । इनके लिए युद्ध वह  स्थिति है जो सत्य और न्याय के सारे द्वार बंद कर देती है । वह स्थिति थोप दी जाती है और जिसे राग द्वेष रहित होकर हटाने के सिवा और कोई दूसरा चारा नहीं है ।  यह साधन हीन का साधन संपन्न से संघर्ष है ।  इसकी चरम परिणति तब दिखाई देती है जब रावण रथारूढ़ होकर युद्ध भूमि में आता हे । और साधन हीन राम रथ की कौन कहे तन - पद - प्राण तक के बिना उसका सामना करने के लिए सन्नद्ध होते हैं । युग - संशय के रूप में विभीषण इस संघर्ष की प्रकृति और परिणाम के प्रति आशंकित होकर धीरज खो बैठते है । राम के इस कार्य के संघर्ष के क्या मायने हैं । वह समझ नहीं पाते ।  तुलसीदास के राम भरत सीता...