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जिन्दगी के आखरी पहर में,,

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अगर मिलना लिखा होगा, तो हम किसी मोड़ पर नहीं, किसी सुकून में मिलेंगे। जहाँ न दुनिया होगी, न उसकी आवाज़। सिर्फ़ इतना होगा कि दो लोग, जिन्होंने बहुत कुछ खोया, आख़िरकार एक-दूसरे को पा लेंगे। चलिए ,,,, वहां जहां झरने हो चहचहाहट  चिड़ियों की हो कोयल की आवाज हो  पेड़ पौधे की आवाज हो  सरसराहट हो  और एक हाथों से बनाई कुटिया हो  हम और आप हो बस बहुत रोई हैं आँखें  इस मतलबी शहर में, अब ठहरना है मुझे बस तुम्हारी लहर में। जो खोया है हमने,  वो क़िस्मत का खेल था, अब पाना है तुमको ज़िंदगी के आख़िरी पहर में।

हारना नहीं है ,,,,

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हार  कोई  विराम  नहीं  होती, वो  तो  बस  एक  अदृश्य  द्वार  है – जहाँ  से  लौटकर  वही  आता  है जो  खुद  को  फिर  से  गढ़ने  का  साहस  रखता है…  शून्य  तो  सिर्फ़  एक  भ्रम  है, असल  में  हर  गिरावट  अपने  साथ अनकहे  सबक़ों  की  पूँजी  छोड़  जाती  है… इसलिए  जब  तुम  दोबारा  चलोगे, तो  कदम  नए  नहीं  होंगे – पर  उनकी  दिशा  में  वो  गहराई  होगी जो  पहले  कभी  थी  ही  नहीं…  क्योंकि  कुछ  शुरुआतें  दिखाई  नहीं  देतीं, वो  भीतर  होती  हैं – और  वही  शुरुआतें  सबसे  दूर  तक  जाती  हैं…  हार असल में अंत नहीं, बल्कि आत्मा को फिर से तराशने का सबसे सुंदर अवसर है। जो गिरकर भी उठता है, वो सिर्फ़ चलना नहीं सीखता ...

स्त्री विशेष

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क्रांतिकारी जीवन और नारी आकर्षण हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में प्रगतिशील दृष्टिकोण के पक्षधर यशपाल का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है  । प्रेमचंदोत्तर उपन्यास कारों में अपनी विशिष्ट विचारधारा इमानदारी और सृजनात्मक शक्ति के कारण उन्होंने अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाया है ।  यशपाल के उपन्यासों में उठाए गए प्रश्न प्रेमचंद के चिंतन का विकास और विस्तार है इनके चिंतन पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है ।  उनके स्त्री संबंधी विचार पर भी मार्क्सवादी चिंतन धारा की देन है ।  इनके साहित्य में सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह अपनी प्रत्येक रचना में बड़ी प्रचुरता के साथ सामाजिक प्रश्नों को उठाते हैं वह सामाजिक शोषण और अत्याचार के खिलाफ स्त्री मुक्ति के प्रश्न को बहुत आग्रह के साथ प्रस्तुत करते हैं । यशपाल ने अपने लेखन में रूढ़ियों अंधविश्वासों से मृत विचारों,  जड़ मान्यताओं ,  घातक धारणाओं का सदैव खुलकर विरोध किया है । स्वयं यशपाल और प्रकाशभारती को आर्य समाजी संस्कार ने इतना आगे बढ़ाया की बंदी जीवन में ही शादी करके उन्होंने समाज के लिए एक क्रांतिकारी ता का अद्भु...
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तू शोर है मेरा, मैं तेरी खामोशी मौनरूपी व्याख्या की महिमा प्रभावशाली होती है ।   उसके सामने क्या मातृभाषा क्या अन्य देश की भाषा सब को सब कुछ प्रतीत होती है । अन्य कोई भाषा दिव्य नहीं केवल व्याख्यान की मौनभाषा ईश्वरीय है । यदि विचार करके देखा जाए तो मौन व्याख्यान किस तरह हमारे हृदय की नाडी में  सुंदरता पिरो देता है ।  वह व्याख्यान ही क्या जिसमे हृदय की धुन को तथा बल के लक्ष्य को ना बदल दिया । चंद्रमा की मंद मंद हंसी का ,,, तारागणों  के कटाक्ष पूर्ण मौन व्याख्यान का प्रभाव ।  किसी कवि के दिल में घुस कर देखा ,,,, कमल और नरगिस में नयन देखने वालों से पूछो कि मौन व्याख्यान,,, की प्रभुता कितनी दिव्य है ,,, मौन की शक्ति की भावना पर आधारित है कि मौन तो ईश्वर प्रदत्त भाषा है ।  इससे आत्मिक गुणों का विकास तो होता ही है अपितु आत्मबल भी बढ़ता है । व्याख्यान व्यक्तित्व के निर्माण तथा विचारधारा को पुष्ट करने में अपनी महती भूमिका निभाता है । व्याख्यान अपने आप में अनेक भागों तथा सिद्धांतों को पिरोए हुए होता है ।  जिससे मानव के हृदय पर अनुकूल प्रभाव पड़े...

नारी: एक संकल्प

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नारी: एक संकल्प! 🌸 तुम्हारा स्त्री होना ही सबसे सुंदर है, यह कोई दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य की बात है कि तुम स्त्री हो... इस दुनिया में किसी के बिना कुछ खास नहीं बदलेगा पर तुम्हारे बिना दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं... गर्व करो कि तुम स्त्री हो.! “तुम मेरे हृदय की वो भावना हो  जिसे शब्दों में नहीं मूक संवाद में भी  व्यक्त नहीं किया जा सकता तुम तो  स्पंदन हो हृदय का देह का अर्धांग हो  अदृश्य-अनुभूति हो  जो अमर्त्य है सदा !!” सही बात. स्त्री के अनेक रूप होते हैं मां, बहन, बेटी लेकिन सबसे खूबसूरत होती है पत्नी, जिसमें हम सब रिश्तों की झलक देखते हैं। परन्तुनाजकल की स्त्रियों ने पत्नी को इतना बदनाम कर दिया कि कुछ बी से लोग बचते हैं, कभी अवैध संबंधों से, कभी 498 के नाम पर kabhi gharelu hinsa ke naam per. कुछ स्त्रियां जब तक मर्यादा में रहकर... सब कुछ सहती हैं बिना एक शब्द कहे तब तक वे उस घर परिवार की लक्ष्मी कहलाती हैं लेकिन जिस दिन वो अपने ऊपर हो रहे अत्याचार या दुराचार के खिलाफ बोलना शुरू कर दें गलत बातों का जवाब देना शुरू कर दे वो तब से कुल्टा,चरित्रहीन और स...

सती प्रथा

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सती प्रथा और सनातन का अपमान......... क्या, सती प्रथा सनातन धर्म की देन है? पोस्ट थोड़ी बड़ी है पर एक बार पढ़ना जरूर  कौआ और कोयल बेशक एक रंग के होते हैं। पर वसंत ऋतु आने पर दोनो का भेद खुल जाता है। जब कोयल मीठे स्वर में गाती है तो सब उसको पहचान ही जाते हैं। कुछ इतिहास कार, भारत मे हर समय बुराइयाँ ही ढूंढते रहते हैं, हर गलत बात को वो सनातन समाज की देन बता दिया करते हैं, आज इस पर ही विचार करेंगे. इन लोगों ने सती प्रथा को भी सदा हम लोगों और हमारे धर्म से जोड़ा है। ये जताने की कोशिस की है कि सनातनी लोग कितने खराब थे, जो नारियों को जिंदा पति के साथ जला दिया करते थे। सनातन धर्म के पुराने ग्रन्थों में इस प्रथा का कहीं भी कोई प्रमाण मुझे आज तक नही मिल पाया। सब से पहले आप रामायण काल को ही देख लें। जब महाराज दशरथ जी की मृत्यु हुई तो क्या तीनों माताएं उनके साथ सती हुई, वो तो एक आदर्श नारियाँ थी। इसका अर्थ ये हुआ कि ऐसी कोई प्रथा थी ही नही। गहि पद भरत मातु सब राखी। रही रानी दर्शन अभिलाषी।। क्या केवल माताएं अपने सती धर्म को छोड़कर भरत जी की बात मानकर सती होने से बची। ऐसा हो ही नहीं ...

वृषाली...स्त्री का त्याग..!!

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महाभारत की एक विस्मृत कथा ....कर्ण की पत्नी, वह स्त्री जिसे कभी चुना नहीं गया जब लोग कर्ण की बात करते हैं, तो वे उसके दुख, निष्ठा और भाग्य की चर्चा करते हैं। पर बहुत कम लोग उस स्त्री को याद करते हैं जिसने उसके जीवन को मौन होकर साझा किया उसकी पत्नी वृषाली। वह शक्ति के किसी महल में जन्मी नहीं थी। वह ऐसी रानी भी नहीं थी जो युद्धों की दिशा बदलती। फिर भी उसने महाभारत का सबसे भारी भाग्य अपने हृदय में उठाया। वृषाली कौन थी? वृषाली कर्ण की प्रथम और मुख्य पत्नी थी— सरल, शालीन और गरिमामयी। उसने कर्ण से विवाह तब किया जब वह अंग देश का राजा भी नहीं बना था, जब संसार उसे अब भी सूत-पुत्र कहकर अपमानित करता था। 👉 उसने किसी नायक से विवाह नहीं किया। 👉 उसने उस पुरुष से विवाह किया जिसे समाज ने ठुकरा दिया था। और उसने उसे कभी नहीं छोड़ा। वह अपमान जिसने सब कुछ बदल दिया द्रौपदी के स्वयंवर में कर्ण आगे बढ़ा। धनुष उठाने से पहले ही द्रौपदी ने उसे उसकी जाति के कारण सार्वजनिक रूप से अस्वीकार कर दिया। उस अपमान ने कर्ण के आत्मसम्मान को तोड़ दिया। पर जिसे लोग भूल जाते हैं, वह यह है—  • वह अपमान केवल कर...

यादें

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कितना अजीब है ना,  दिसंबर और जनवरी का रिश्ता ? जैसे पुरानी यादों और नए वादों का किस्सा भरपूर विश्वास है दोनों आसपास है फिर भी एक साल की प्यास है ख़ूबसूरत पलों के झरोखे दिल में गुलदस्ते सज़ा लेते हैं गुलाबों के बीच ख़ुद  को बगिया बना लेते हैं। इस कद्र को अपने होने का  एहसास जगा जाता है गुज़रा साल दिल में  दोनो मे गहराई है दोनों वक़्त के राही है यूँ तो दोनों का है वही चेहरा-वही रंग उतनी ही तारीखें  पर पहचान अलग है दोनों की अलग है अंदाज़ और  अलग हैं ढंग... एक अन्त है एक शुरू

हिसाब नहीं रख पाती है स्त्री,,,

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कहा जाता हैं कि,,  स्त्री गणित में कमजोर होती हैं.. कमसे कम उनके निजी जीवन में तो ये बात बिल्कुल सही बैठती हैं.. अगर कोई उन्हें अँजुली भर भी प्रेम दें तो वो उसे प्रेम का सागर बनाकर लौटाती हैं..  उन्हें जो भी मिलता हैं वे उसमें वृद्धि कर के ही लौटाती हैं.. फिर चाहे वो प्रेम हो..सम्मान हो..या अपमान..!! लेकिन मै तो यही कहूंगी कि   स्त्री गणित में कमजोर नहीं, बस उनके हिसाब अलग होते हैं। जहाँ उन्हें मुट्ठी भर प्रेम मिले, वहाँ वो सागर लुटा देती हैं। पर अगर अपमान मिले, तो वही हिसाब कई गुना होकर लौटता है। ये उनकी ताकत है, जो हर एहसास को बढ़ाकर लौटाने का हुनर रखती हैं। आप दुनिया को देखिए ना। बेचारी स्त्रियां किसी क्षेत्र में अग्रणी नहीं हो पाई। राजनीति में देखिए, नहीं दिखाई देंगी; कला में देखिए, कम दिखाई देंगी; विज्ञान में देखिए, कम दिखाई देंगी। वो घरों में बस दिखाई देती हैं, और इसमें बहुत बड़ा योगदान भावनाओं का है। वो भावुक ही पड़ी रह जाती हैं, और कुछ नहीं कर पाती जिंदगी में। अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी। इन दो चीज़ों के अलावा स्...

क्या लिखूं,,,??

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नए पाठक लम्बा साहित्य पढ़ने से घबराते हैं।  यही कारण है कि वर्तमान में सबसे ज़्यादा कविताएँ लिखी जा रही हैं।  इतनी ज़्यादा लिखी जा रही हैं कि पढ़ने वालों की कमी हो गई है। आज के दौर में कविताएँ लिखने का एक सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि उसे बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचाने के लिए आपको संग्रह छपवाने की आवश्यकता नहीं है।  आप सोशल मीडिया पर अपलोड करके भी उचित प्रतिक्रिया पा सकते हैं। जबकि कहानी और उपन्यास के साथ ऐसा नहीं है।  इसके लिए आपको किताब छपवानी ही पड़ेगी। सोशल मीडिया पर इतना लंबा साहित्य कोई नहीं पढ़ेगा। खासकर तब जब आपका मनोरंजन 10 सेकंड की रील देखकर हो जा रहा हो। साहित्य वही जीवंत होता है, जो मन के किसी कोने को छू जाए । वरना, कई किताबें बस ऐसे ही लिख दी जाती हैं - ना उनमें कोई दिशा होती है, ना कोई दिल । कभी-कभी सोचती हूँ कि कोई किताब लिखूँ पर अभी लिखना शुरू भी नहीं किया है मैंने और किताब के अंत से डर गई हूँ.. सोचती हूँ कि क्या मैं कहानी को अंत तक ले कर जा भी पाऊँगी या नहीं या ले कर गई भी तो क्या मेरी ज़िंदगी में आई कई कहानियों की तरह उसका भी अंत होगा, भयावह। जो...

you are special,,,,,

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असफलता जीवन का एक ऐसा अध्याय है, जिसे हम भले ही पसंद न करें, लेकिन यह हमें सिखाने के लिए आती है।  असफलता हमें हमारी कमजोरियों को पहचानने और मजबूत बनने का अवसर देती है। यह हमें याद दिलाती है कि गिरना कोई अपराध नहीं है, लेकिन गिरकर उठना और फिर से प्रयास करना हमारी ताकत है। प्रत्येक उत्कृष्ट कार्य पहले पहल असम्भव होता है।  ~ थॉमस कार्लेले  लाइब्रेरी में किताबों के साथ बिताया समय, असफलताओं से मिली सीख, दोस्तों का साथ और जीवन की हर छोटी-बड़ी खुशियां, यही हमें एक संपूर्ण और सुंदर जीवन जीने का रास्ता दिखाती हैं। याद रखिये,,, एक इच्छा कुछ नही बदलती, एक निर्णय कुछ बदलता है...लेकिन एक निश्चय सब कुछ बदल देता है।  जब भी जीवन में संकट आता है  सहनशक्ति पैदा कीजिए ….. जो सहता है वो रहता है... आत्मविश्वास जिंदगी की सबसे  खूबसूरत होती है जो आपके पूरे  जीवन को खूबसूरत बनाये रखती है।  तारों में तुम सूर्य हो.. ग्रहों में तुम बृहस्पति..   द्वीपों में तुम गैलापागोस हो... महाद्वीपों में  जम्बुद्वीप.. पर्वतों में तुम कैलाश हो... महासागरों में प...

मानसिक विकृति

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मानसिक_विकृतता   1. अकेली रहती है! मतलब साथ (सेक्स) की जरूरत तो होगी ही, ट्राय तो मार मौज़ करने के लिए बेस्ट ऑप्शन है।   2. बाहर रहकर पढ़ी है मतलब घाट-घाट का पानी पी हुई है। पक्का कैरेक्टरलेस है। हाथ रखते ही तैयार हो जाएगी।  ऐसों का क्या ?   3. दिल्ली में रहती है मतलब खुली होगी। मेट्रो सिटीज़ में रहने वाली लड़कियां तो बहुत खुली होती हैं, पता नहीं कितनों के साथ सो जाए। यहाँ खुली का मतलब सेक्स के लिए हमेशा आसानी से उपलब्ध रहने से है।  3. गाँव की है, सीधी होगी। मतलब इसको आसानी से बेवकूफ़ बनाकर यूज़ कर सकते हैं।   4. ब्रेकअप हो गया है! मतलब रोती लड़की को विश्वास देकर सेक्स की जुगाड़ की जा सकती है।   5. पहले बॉयफ्रेंड ने चीट किया है! ओह्ह बेबी मैं ऐसा नहीं हूँ। दुनिया से अलग हूँ। यार चीट हुई लड़कियों को यूज़ करना औऱ आसान है।  सिली गर्ल्स......  6. नीच जात की है! यार ये छोटी जातियां होती बहुत बेवकूफ़ हैं। मैं जाति को नहीं मानता, शादी करूँगा बस इतने में तो तन- मन-धन से समर्पित हो जायेंगी।   7. काल...

स्त्री

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शिक्षा एवं सामाजिक जागरूकता की भावना ने छुआछूत जातिगत भेदभाव का समाज में खुलकर विरोध किया है ।  विज्ञान एवं यांत्रिकता का प्रसार ने तथा  भौतिकवाद ने स्त्री-पुरुष संबंधों में बदलाव एवं तनाव भी उपस्थित कर दिए हैं । इन तनाव समस्याओं को खत्म करने तथा इनको भरने के लिए नवीन मानवीय मूल्यों की खोज की जा रही है ।  इस खोज में परंपरागत आदर्शों एवं नैतिक मान्यताओं का विरोध होना स्वभाविक है ।    नवीन मानवीय संबंधों की खोज को और आधुनिक युग में व्यक्ति को प्रेरित किया है । इसके अतिरिक्त नए मूल्यों की स्थापना के प्रयास में प्राचीन संबंध भी विघटित होने लगे हैं ।  यांत्रिक सुविधाओं ने नैतिक मान्यताओं में परिवर्तन उपस्थित कर दिए हैं । संबंधों में स्वच्छंदता भी आने लगी है । इसी उन्मुक्त और स्वच्छंदता का परिचय देती हुई दादा कॉमरेड की शेल कहती है --- "क्या संसार भर की अच्छाई एक ही व्यक्ति में समा सकती है । "  प्राचीन परंपराएं मान्यताएं एवं आदर्शों का विरोध हो रहा है।  किंतु स्वस्थ नए मूल्यों का भी अभाव है । यह  विरोधी जीवन मूल्यों का निर्माण कर रह...

मेरी पीड़ा

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मेरी पीड़ा ...  किसी ने कहा आज,,, पत्थर हो गई हो तुम ... शायद .... नहीं मैं पत्थर नहीं हूं  मेरे पास भी वही आंखे जो रोना चाहती है  रो नही पाती और बात है... मेरे पास भी वही हृदय जो धड़कना चाहता है... फिर धड़कता क्यों नहीं .. हां...ज़रूर पत्थर हूं मैं। मुझे प्रेम नहीं..सम्मान चाहिए । दे पाओगे तुम मुझे सम्मान ...?? अब मन उस अवस्था मे है जहाँ हर चीजो को देखने का नजरिया बदल गया है,पहले जिन चीजों को देखकर डर लगता था अब वो डर खत्म हो गया और अब सिर्फ लोगों से डर लगता है,भूतों से नही....! ~ डॉ नीतू शर्मा

स्त्री

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दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दु:शासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी। महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया। भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखा...।। भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जब-तक सब देख नहीं लिया, तब-तक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था। धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका। दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला। द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्...

वेदों में स्त्री

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सनातन धर्म ऐसा धर्म है जहाँ पूरे ब्रह्माण्ड की शक्ति का स्त्रोत आदिशक्ति को कहा गया है और नारी को उसी आदिशक्ति का रूप कहा गया है हमारे वेद क्या कहते हैं नारी के बारे में.. वेद नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं वेदों में स्त्रियों की शिक्षा- दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के अन्य धर्मग्रंथ में नहीं है वेद उन्हें घर की साम्राज्ञी कहते हैं और देश की शासक, पृथ्वी की साम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा, जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है, उसे सदा विजयिनी कहा गया है और उन के हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है  वैदिक काल में नारी अध्ययन अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र में भी जाती थी जैसे कैकेयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई थी कन्या को अपन...

ताली क्यों बजाई जाती है ,,,??

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हमारे हिन्दू सनातन धर्म में आरती अथवा कीर्तन करते समय तालियां क्यों बजाई जाती है.....? आरती अथवा कीर्तन में ताली बजाने की प्रथा बहुत पुरानी है... और *श्रीमद्भागवत के अनुसार कीर्तन में ताली की प्रथा श्री प्रह्लाद जी ने शुरू की थी.... क्योंकि, जब वे भगवान का भजन करते थे... तो,जोर-जोर से नाम संकीर्तन भी करते थे तथा, साथ-साथ ताली भी बजाते थे...... और, हमारी आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि..... जिस प्रकार व्यक्ति अपने बगल में कोई वस्तु छिपा ले और, यदि दोनों हाथ ऊपर करे तो वह वस्तु नीचे गिर जायेगी.... ठीक उसी प्रकार जब हम दोनों हाथ ऊपर उठकर ताली बजाते है.. तो, जन्मो से संचित पाप जो हमने स्वयं अपने बगल में दबा रखे है, नीचे गिर जाते हैं अर्थात नष्ट होने लगते है.. कहा तो यहाँ तक जाता है कि.... जब हम संकीर्तन (कीर्तन के समय हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाना) में काफी शक्ति होती है और, हरिनाम संकीर्तन से हमारे हाथो की रेखाएं तक बदल जाती है...... परन्तु यदि हम आध्यात्मिकता की बात को थोड़ी देर के छोड़ भी दें तो..... एक्यूप्रेशर सिद्धांत के अनुसार मनुष्य को हाथों में पूरे शरीर के अंग...

क्या आप जानते है,, ??

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क्या आप जानते है ,,,? पत्नी वामांगी क्यों कहलाती है? पत्नी को वामंगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है। इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है शिव का अर्धनारीश्वर शरीर। यही कारण है कि हस्तरेखा विज्ञान की कुछ पुस्तकों में पुरुष के दाएं हाथ से पुरुष की और बाएं हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है। कहा गया है कि स्त्री पुरुष की वामांगी होती है इसलिए सोते समय और सभा में, सिंदूरदान, द्विरागमन, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती। वामांगी होने के बावजूद भी कुछ कामों में स्त्री को दायीं ओर रहने के बात शास्त्र कहता है। शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं ओर बैठना चाहिए। पत्नी के पति के दाएं या बाएं बैठने संबंधी इस मान्यता के पीछे तर्क यह है कि जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है...

कलियुग ,,,,,,,

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          ****** पंडित जी तो महिलाओं को तिलक भी स्वयं नहीं लगाते। पर शादी में अब साड़ी ब्लाउज इत्यादि पहनाने वालों को बुलाया जाने लगा है या इन स्त्रियों को ही सेंटरों पर बुलाया जाने लगा है ! अब किसी भी अवसर पर महिलाओं को साड़ी पहनाने से लेकर, मेहंदी, सैलून, टेलर, टैटू सब काम पुरुष कर रहे हैं, वे भी गैर हिन्दू। ये कथित आधुनिकता हिन्दू समाज को कहाँ तक ले जाएगी……? मेहंदी के बाद अब महिलाओं को साड़ी पहनना भी सेंटरों पर पुरुष सिखा रहे हैं! एक गैर पुरूष द्वारा साड़ी खींचने पर जिस देश में महाभारत हो गई थी उस भारत में स्त्री खुद साड़ी उतारने खड़ी है। हां आज स्त्री स्वयं ही पुरुष से न केवल जिम में अपने निजी अंगों का स्पर्श सुख भोग रही है बल्कि साड़ी भी उतार पहन रही हैं।।  ये प्रगति नहीं है संस्कारों का पतन ही हमारी मृत्यु है ?? आधुनिकता के नाम पर हमारी संस्कृति को मिट्टी मैं मिलाया जा रहा है आज कल की लड़कियों को , अगर उनको साड़ी ना पहन ना आता है तो खुद को मॉडर्न समझती है गर्व से कहती है कि हमे साड़ी पहननी नही आती अभी इससे भी बहुत बुरा बाकी है Kalyuga is l...

ये कैसी आधुनिकता ,,,

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***** हिंदू धर्म में लड़कियों के सर ढक कर रखने की पुरातन परंपरा है जिसे हिंदू धर्म में घूंघट करना सर पर आंचल या दुपट्टा रखना कहते है । कोई भी स्त्री विवाह के बाद जब अपनी ससुराल जाती है और बहु पत्नी भाभी जैसे कई रिश्तों में बंधती है तो वो सभी के सम्मान में अपने सर पर कपड़ा रखती है कभी मंदिर में प्रवेश करना हो तो सर ढक कर ही प्रवेश करती है ये सनातन धर्म की परंपरा है ।  लेकिन आधुनिकता फैशन खुलापन टूटते संयुक्त परिवार और अपने अधिकार के नाम पर आज हिंदू लड़किया खुद को एक प्रोडक्ट के रूप में दिखा रही है सभी जानते है हम उसी दुकान से सामान खरीदना पसंद करते है जहां पर डिस्प्ले अधिक आकर्षक होता है । आज लड़किया ये तो कहती है कि वो कुछ भी पहने ये उनका मौलिक अधिकार है लेकिन भूल जाती है समाज में किसी की सोच और नजर को नही बदला जा सकता जब हम खुद ही भेड़ियों का शिकार बनने के लिए तैयार है तो क्यों भेड़ियों को दोष दे कि सामने वाला गलत है । एक लड़की जो आधुनिक छोटे छोटे कपड़े पहन कर अपने शरीर प्रदर्शन करके दूसरो की भावनाओ को भड़काने में शर्म महसूस नहीं करती तो फिर को उसके साथ जो गलत करता ...