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"पीड़ा"

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******** " मेरी पीड़ा ने मुझे सौ बार रुलाया है ,,,, लेकिन सच भी है इनको मैंने ही तो बुलाया है ,,,, वास्तविक रूप तो यही है कि सच्चाई पर सुंदर सा कफ़न डाल कर उस पर शाल चढ़ा देते है । कोन समझता है किसी की पीड़ा को,,, दूसरे के दर्द को ,,,, ।।  "इतना आसा नही  है इस दौर में मिलना जुलना ,,,      सोचना पड़ता है कैसी लगु कैसी ना लगु  ,,,,,"  मनुष्य को हमेशा सामाजिक होने की सलाह दी जाती है क्योंकि वह कभी मुसीबतों में फंसता है तो लोगों के तथा परिवार जनों के सांत्वना भरे शब्द उसे हताश होने और निराशा के गर्त में जाने से रोक सके ।  सौ बात की एक बात यदि परिवार जन हाल-चाल जानने तक के लिए अगर बातचीत नहीं करते तो परस्पर प्यार कम हो जाता है तथा हीन भावना बढ़ जाती है ।  वर्तमान समय में परिवार इतने सीमित हो गए हैं कि हर एक सिर्फ अपने भले की फिक्र में लगा हुआ है दूसरे की भलाई की कोई चिंता नहीं ।  आज के समय बहुत कम ऐसा होता है कि लोग एक दूसरे से मिलकर बातचीत करते हो ।  वर्तमान समय में परिस्थितियां इतनी बदल गई है कि आज बह...

सम्मान / रूपया

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                     *** अंग्रेजी में एक शब्द "आनार्की " है ।  जिसका अर्थ प्प्रायः गड़बड़ के अर्थ में लिया जाता है परंतु मूल शब्द ग्रीक भाषा का है और इसका अर्थ बगावत नहीं बल्कि बंधन न होना है ।  अर्थ  ( धन ) को महत्व देने वाले रिश्ते ज्यादा समय तक फलीभूत नहीं हो पाते  ।   हां कुछ समय तक दबाव बनाकर उन को घसीटा जरूर जा सकता है लेकिन वह संवेदनहीन होकर मृतप्राय हो जाते हैं ।  वर्तमान समय में परिवार में रिश्ते पैसे का खेल बन गए हैं यहां पर पैसे के बल पर ही अधिकार व अवसरों की प्राप्ति होती है और अवसर और साधन   बिना धन के प्राप्य नही  ।  सुधार का यह अर्थ होता है कि वर्तमान समय की समस्याओं का अंत कर नई व्यवस्था को लागू करना ना कि अपने शोषण के अधिकार को तिल भर भी नहीं छोड़ना या  नई समस्या को उत्पन्न कर देना यह सुधार नहीं ।  यदि परिवार में किसी सदस्य पर कोई संकट आ जाता है तो सभी मिलकर उसका कोई न कोई हल खोज लेते हैं ।  लेकिन वास्तविक स्थिति विपरीत है आर्थ...

स्त्री : जीवन शक्ति का आधार

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----------------------- माखनलाल चतुर्वेदी ने मुख्यतः क्रांतिकारी और गांधीवादी कवि होते हुए भी धार्मिक अंधविश्वासों एवं पुरानी मान्यताओं पर कठोर प्रहार किया है ----      " हम हैं नहीं रूढ़ि की पुस्तक के पथरी ले भार       नित नवीनता के हम हैं जग के मौलिक उपहार ।"  जीवन और अनुभूति के साथ-साथ आवश्यक है स्वयं के अस्तित्व में व्यक्तिगत स्वतंत्रता व्यक्तिगत निर्णय की महत्ता हो जिसमें जीवन रहने की क्षमता हो ।   वर्तमान युग में स्त्रियों को पुरुषों के समान ही सामाजिक व राजनीतिक अधिकार मिलने लगे हैं परंतु स्त्री की   पराश्रयता  जारी है ।  स्त्री को भले ही पुरुष का दास ना कह कर उसका साथी ' कहा जाता है लेकिन साथ ही उसे उपदेश भी दिया गया है कि उसे पुरुष के आश्रय में ही रहना चाहिए ।  समाज में जीवन निर्वाह का ऐसा ढंग बना दिया गया कि स्त्री व्यक्ति की संपत्ति और मिल्कियत ही रहेगी वह पुरुष के अधीन रहकर उसका वंश चलाने व उसके उपयोग  , भोग की वस्तु ही बनी रहेगी ।  कहीं  - कही तो सदाचार धार्मिक सामाजिक नियमों ने...

** मानवी **

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स्त्री प्रश्न : आज भी जिंदा हैं

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------------- ------------ स्त्री मुक्ती कि जब भी चर्चा होती है तो पूरी बहस आकर मध्यम वर्गीय स्त्री पर केंद्रित हो जाती है  ।  जहां उसका संघर्ष दैहिक स्वतंत्रता से लेकर आर्थिक स्वतंत्रता तक ही सिमटा हुआ पाते हैं ।  वास्तविकता यही है कि आज का समाज स्त्रीत्व को लेकर उसके चारों तरफ  परंपरागत ढंग से  उसको महिमामंडित कर उसके आसपास ऐसा जाल बुनता है कि स्त्री विमर्श के प्रश्न हाशिए पर ही रह जाते हैं  ।  स्त्री ने अपने अनेक अधिकारों को भी प्राप्त किया है किंतु इसके अतिरिक्त अनेक क्षेत्र आज भी ऐसे हैं जहां स्त्री अस्मिता  , अस्तित्व ,  मुक्ति आज भी गायब है ।  पारिवारिक छोटे-छोटे दकियानूसी मसलों व संकुचित संकीर्ण विचारों में पिसती  स्त्री स्वयं की प्राथमिकताएं भूल जाती है ।  आज भी जिंदा है वे सभी प्रश्न जो स्त्री मुक्ति से जुड़े हुए हैं ।  स्त्री को उन सभी निरर्थक परंपराओं व मान्यताओं से मुक्ति चाहिए जिसने उसके अधिकारों व स्वतंत्रता को रोके रखा है ।  जन्म से लेकर मृत्यु तक पिता पति और पुत्र के साथ  पैबंद ...

परिवार : एक पवित्र संस्था ।

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" आनंद पाने से अधिक बांटने में मिलता है । "  वर्तमान समय में मध्यम वर्गीय समाज के जीवन को परिचालित व प्रेरित करने वाली  नयी प्रवृतियों विचारधाराओं व शक्तियों का उद्घाटन हुआ है ।  पुराने बंधन अब जीवन का आधार नहीं रहे विकासशील शक्तियां और प्रतिक्रियावादी ताकतों सच और झूठ एवं नए-पुराने का भीषण निर्दय संघर्ष वर्तमान समय में देखा जा सकता है ।  परिवार एक पवित्र तथा उपयोगी संस्था है ।  लेकिन वर्तमान समय में इस दृष्टिकोण में परिवर्तन होता जा रहा है ।  परिवार के सभी सदस्य भी अपनी अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं ।  वस्तुतः पारिवारिक जीवन में कलह असंतोष  ,  खिन्नता और उदासी की परिस्थितियां बन जाती है कहीं-कहीं तो यह विकराल रूप भी ले लेती है ।  स्त्री के बिना परिवार की कल्पना भी असंभव है । लेकिन वर्तमान समय में स्त्री की भूमिका भी बदल रही है ।  वह ना तो पहले की तरह त्याग और संतोष जैसे गुणों को  अपनाना चाहती है  और ना ही अपने परिवार के सुख और दुख को अपना  बनाना चाहती है ।  परिवार की प्रतिष्ठा हमारी...

पुरुष को मनुष्य बना सकने के लिए स्त्री को ओर कितना सहन पड़ेगा ,,,,,,??

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--------------------------------------- सामंतवादी पुरुष के हमको मेरा लेखन नागवार लग सकता है ।  लेकिन मेरा आक्रोश समाज कि उस व्यवस्था के प्रति है जो अपनी छद्म नीतियों और मोह से मुक्त नहीं होना चाहता ।  सामंतवादी नीतियों पर आधारित सत्ता के   चक्के में स्त्री हमेशा से ही पिसती आई है ।  ईश्वर संबंधी धारणा पर फैले अंधविश्वास और पुरातन रूढ़ियों से क्षुब्ध हो स्त्री भी आज मुक्त होना चाहती है ।  इन आडम्बरों ने स्त्री जाति को बहकाकर रखा है । अपने स्वार्थ पूर्ति में अंधी स्वार्थपरता अवसरवादी चालें चलकर अपने अदम्य लालसा पूर्ति करती है ।  यह हमारे समाज की सबसे ज्वलंत सच्चाई भी है । धार्मिक एवं सामाजिक अंधविश्वासों तथा रूढ़ियों से ग्रस्त जीवन में परिवर्तन होना अनिवार्य है ।  समाज में निरीह स्त्री का अपमान एवं तिरस्कार करने वाले जघन्य एवं कुत्सित घटनाओं का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता जा रहा है ।  स्त्री जाति पर होने वाले पाशविक ओर अमानवीय कुकृत्यों को देख कर तो लगता है कि स्त्री मुक्ति के किसी स्वप्न को साकार करने की कल्पना निरर्थक बेमानी है...