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रिश्ते या राजनीति ,,??

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रिश्तो ने जब भी चली राजनीति की चाल  तब तब आया है यहां घर घर में भूचाल ,,, बदलते परिवेश में रिश्तो की परिभाषा भी जरूर बदलती है पर वास्तव में  रिश्तो की अहमियत आज भी उतनी ही है जितनी पहले हुआ करती थी ।  हर स्थिति में अपने हर रिश्ते को सदा बहार रखने का एक ही मंत्र है --- उस रिश्ते को समुचित रिस्पेक्ट देना । जब भी कभी किसी रिश्ते में दरार पड़ने लगती है तो ज्यादातर अपने साथी पर ही दोषारोपण करने लग जाते हैं  । लेकिन जरा सोचिए ---- क्या एक हाथ से ताली बजाई जा सकती है,,,?? इसीलिए जरा अपने साथी को दोष देने से पहले यह भी सोच विचार ले कि कहीं इस परेशानी की जिम्मेदार आप तो नहीं है । कुछ रिश्ते हमारे जन्म के साथ ही जुड़ जाते हैं ---- माता-पिता  , मामा , चाची , भाई बहन ।  लेकिन कुछ रिश्तो को हम उम्र के हर दौर में हम स्वयं बनाते हैं आज व्यक्ति अपनी पहचान और रिश्ते स्वयं के किरदार की बदौलत नहीं बल्कि पैसे से बनाना चाहते हैं ।  वर्तमान समय में रिश्तो में मानवीय संवेदना और भावनाओं का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है । वर्तमान में आगे बढ़ते रिश्तो में आपसे...

स्त्री प्रश्न

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भोजपुरी में एक कहावत कही जाती है ---- त्रिया जन्म मत देबू हो विधाता " नारी चाहे वह मां के रूप में तथा सृष्टि के सृजन कर्ता के रूप में हो या बच्चों की पालनहार मां का ममत्व अथवा एक पत्नी के रूप में सृष्टि के प्रारंभ से ही स्त्री अपनी भूमिका बखूबी निभा रही है । आज की स्त्रियां शिक्षा के क्षेत्र में भी बढ़ोतरी कर रही है । लेकिन शिक्षित महिलाओं के साथ भी इस सभ्य पुरुष समाज में अपराधों की संख्या कम नहीं हो पा रही है । मैंने सभ्य पुरुष इसलिए कहा क्योंकि सारी सभ्यता का ठेका तो सिर्फ पुरुष वर्ग ने ही ले रखा है ना ,,,,!!! हम आज भी देखते हैं कि लड़कियों के साथ जो भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता है । यदि संतान लड़की के रूप में जन्मी हो तो परिवार पर दुख के बादल मंडराने लगते हैं । आज आधुनिक समाज में समय का तकाजा है कि दकियानूसी बातों को त्याग कर वर्तमान में जिए आज के इस समाज को निडर शिक्षित समझदार और पहल करने वाली स्त्री की आवश्यकता है । स्त्री को भी अपने अस्तित्व को स्थिर रखने के लिए त्याग को छोड़कर स्वयं का विकसित करना होगा क्योंकि स्त्री हमेशा से ही त्याग की मूर्ति रही है...

स्त्री अधिकार चाहती है .... भिक्षा नही !!

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पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति के चलते स्त्री की छवि को सीधे-सीधे प्रश्नों के घेरे में डाला गया है । रघुवीर सहाय की पुस्तक  'सीढ़ियों पर धूप '  में से यह पंक्तियां देखिए---  पढ़िए गीता बनिए सीता फिर इन सब में लगा पलीता किसी मूर्ख की हो परिणीता निज घर बसाइये होय कटीली  आंखें गीली  लकड़ी सिली ,तबीयत ढीली  घर की सबसे बड़ी पतीली भर भर भात पसाइये  ,,,?? स्त्री की छवि सत्य यही रही है कि वह सीता की तरह हो लेकिन प्रश्न यह है कि सीता की तरह होना क्या है । नारी के पीछे पीछे चलते हुए देखने की अहंकारी पुरुष प्रवृत्ति पर चोट  ---- यह --- ओह ,  भारतीय स्त्री ! तुझे मेरी करुणा की कितनी जरूरत है । यह स्त्री विमर्श स्त्री के इंसान होने की सही और सहज सत्ता की खोज और स्थापना का है ।  वर्णन अलग अलग हो सकते हैं ,,,, शैली भी अलग हो सकती है,,,, लेकिन स्त्री को उचित ही इंसान के रूप में देखना , पकड़ना और पाना है । पुरुष के द्वारा स्त्री को प्राय करुणा की वस्तु के रूप में देखने और चित्रित करने का विरोध है । स्त्री के ताकतवर रूप को भले ही प्रक...

अंधेरे का सफर : टूटते रिश्ते

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मैं क्या लिखती हूं ,,,,  और मेरे लिखने से क्या फर्क पड़ता है ,,,, यह मैं कई बार सोचती हूं लेकिन मैं तब लिखती हूं जब मेरे अंदर कुछ उबलता है  । एक श्लोक है ---    नास्ति पूज्या न निधा च   जननी भूत्वा न सार्थिका वरवन्नेव प्रजा नारी आधकर्म - त्याग - भोग्यो :  अथार्त स्त्री न विशेष पूजा की पात्र है  ,  न निन्दा की ओर न वह एक मात्र माँ बनकर सार्थक होती है । बल्कि यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि वह हर कर्म , त्याग और भोग्य में बिल्कुल पुरूष की तरह ही अधिकारी है । वह भी इंसान हैं जैसे कि पुरूष । पहले नारी को शांति व सौम्या का प्रतीक माना जाता था  । उसके विद्रोही स्वरूप की कल्पना नहीं की गई थी किंतु जीवन की कटु परिस्थितियों पुरुष वर्ग का अनुचित व्यवहार तथा पूंजीवादी शोषण के कारणों से उसे विद्रोही बना दिया  । नारी के इस विद्रोह के परोक्ष में सामाजिक परिस्थितियां है उसके अंदर का स्वाभिमान पुरुष के पुरूष के खिलाफ विद्रोह कर देता है । आज मानव बंधन विहीन होकर जीना चाहता है ।  यही स्वच्छंदता धीरे धीरे स्त्री वर्ग में भी फैलती ज...

"पीड़ा"

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******** " मेरी पीड़ा ने मुझे सौ बार रुलाया है ,,,, लेकिन सच भी है इनको मैंने ही तो बुलाया है ,,,, वास्तविक रूप तो यही है कि सच्चाई पर सुंदर सा कफ़न डाल कर उस पर शाल चढ़ा देते है । कोन समझता है किसी की पीड़ा को,,, दूसरे के दर्द को ,,,, ।।  "इतना आसा नही  है इस दौर में मिलना जुलना ,,,      सोचना पड़ता है कैसी लगु कैसी ना लगु  ,,,,,"  मनुष्य को हमेशा सामाजिक होने की सलाह दी जाती है क्योंकि वह कभी मुसीबतों में फंसता है तो लोगों के तथा परिवार जनों के सांत्वना भरे शब्द उसे हताश होने और निराशा के गर्त में जाने से रोक सके ।  सौ बात की एक बात यदि परिवार जन हाल-चाल जानने तक के लिए अगर बातचीत नहीं करते तो परस्पर प्यार कम हो जाता है तथा हीन भावना बढ़ जाती है ।  वर्तमान समय में परिवार इतने सीमित हो गए हैं कि हर एक सिर्फ अपने भले की फिक्र में लगा हुआ है दूसरे की भलाई की कोई चिंता नहीं ।  आज के समय बहुत कम ऐसा होता है कि लोग एक दूसरे से मिलकर बातचीत करते हो ।  वर्तमान समय में परिस्थितियां इतनी बदल गई है कि आज बह...

सम्मान / रूपया

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                     *** अंग्रेजी में एक शब्द "आनार्की " है ।  जिसका अर्थ प्प्रायः गड़बड़ के अर्थ में लिया जाता है परंतु मूल शब्द ग्रीक भाषा का है और इसका अर्थ बगावत नहीं बल्कि बंधन न होना है ।  अर्थ  ( धन ) को महत्व देने वाले रिश्ते ज्यादा समय तक फलीभूत नहीं हो पाते  ।   हां कुछ समय तक दबाव बनाकर उन को घसीटा जरूर जा सकता है लेकिन वह संवेदनहीन होकर मृतप्राय हो जाते हैं ।  वर्तमान समय में परिवार में रिश्ते पैसे का खेल बन गए हैं यहां पर पैसे के बल पर ही अधिकार व अवसरों की प्राप्ति होती है और अवसर और साधन   बिना धन के प्राप्य नही  ।  सुधार का यह अर्थ होता है कि वर्तमान समय की समस्याओं का अंत कर नई व्यवस्था को लागू करना ना कि अपने शोषण के अधिकार को तिल भर भी नहीं छोड़ना या  नई समस्या को उत्पन्न कर देना यह सुधार नहीं ।  यदि परिवार में किसी सदस्य पर कोई संकट आ जाता है तो सभी मिलकर उसका कोई न कोई हल खोज लेते हैं ।  लेकिन वास्तविक स्थिति विपरीत है आर्थ...

स्त्री : जीवन शक्ति का आधार

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----------------------- माखनलाल चतुर्वेदी ने मुख्यतः क्रांतिकारी और गांधीवादी कवि होते हुए भी धार्मिक अंधविश्वासों एवं पुरानी मान्यताओं पर कठोर प्रहार किया है ----      " हम हैं नहीं रूढ़ि की पुस्तक के पथरी ले भार       नित नवीनता के हम हैं जग के मौलिक उपहार ।"  जीवन और अनुभूति के साथ-साथ आवश्यक है स्वयं के अस्तित्व में व्यक्तिगत स्वतंत्रता व्यक्तिगत निर्णय की महत्ता हो जिसमें जीवन रहने की क्षमता हो ।   वर्तमान युग में स्त्रियों को पुरुषों के समान ही सामाजिक व राजनीतिक अधिकार मिलने लगे हैं परंतु स्त्री की   पराश्रयता  जारी है ।  स्त्री को भले ही पुरुष का दास ना कह कर उसका साथी ' कहा जाता है लेकिन साथ ही उसे उपदेश भी दिया गया है कि उसे पुरुष के आश्रय में ही रहना चाहिए ।  समाज में जीवन निर्वाह का ऐसा ढंग बना दिया गया कि स्त्री व्यक्ति की संपत्ति और मिल्कियत ही रहेगी वह पुरुष के अधीन रहकर उसका वंश चलाने व उसके उपयोग  , भोग की वस्तु ही बनी रहेगी ।  कहीं  - कही तो सदाचार धार्मिक सामाजिक नियमों ने...