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कर्म / भाग्य

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-------- --------- पैर मिले हैं ,,, चलने को तो पांव पसारे मत बैठ,,,  आगे आगे चलना है तो हिम्मत हारे मत बैठ ,,,, कहा गया है कि जीवन में बिना कर्म के कुछ नहीं मिल सकता । लेकिन इस दुनिया में कर्म को मानने वाले लोग कहते हैं कि भाग्य कुछ नहीं होता और भाग्यवादी का मानना यह है कि जो कुछ लिखा होगा वही होगा । गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ----- " कठिन करम गति जान विधाता जो शुभ अशुभ शक्ल फल दाता । " भाग्य को चमकाने के लिए इंसान न जाने कितने तरीके और उपाय करता है ।लेकिन वह वास्तविक रूप में अपना भाग्य चमकाना है तो सबसे पहले अपने आप से अच्छा व्यवहार करें और खुद का सम्मान करें अच्छा पाने के लिए अच्छा करना भी पड़ता है बुरे के साथ कभी अच्छा नहीं होता कहते हैं ना कि --- " बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाए ।" चाणक्य नीति  कहती है कि ----  " मनुष्य अपने कर्मों से महान होता है अपने जन्म से नहीं " किसी विद्वान ने तो सफलता की परिभाषा को ही बदलते हुए कह दिया है कि --- सफलता जीवन में मिले आपके पास शोहरत और धन दौलत से निश्चित नहीं होती बल्कि आपके जीवन...

स्त्री की आज़ादी -- उसके *पर्स * में ही है ,,,,

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------- ** ------ एक ही अंतहीन क्षितिज कक्ष में में जी रही हूं  --- और वह क्षण जरा भी नहीं बदलता टस से मस नहीं होता ।  मैं मानो एक काल निरपेक्ष क्षण में टंगी हुई हूं --- वह क्षण काल की लड़ी में से टूट कर कहीं छिटक गया है और इस तरह अंतहीन हो गया है ---- अंतहीन और अर्थहीन ।            *अपने - अपने अजनबी* किताबों की दुनिया एक अलग दुनिया होती है जो हमें स्वतंत्र और स्वायत्त बनाती है । मेरा मानना है कि हमारे सभी सवालों का जवाब हमें यही मिल सकता है इस किताबी दुनिया के बीच । स्त्री प्रश्न या स्त्री मुक्ति प्रश्न बहुत बड़ा है । इसे मनुष्यता को अवश्य ही सुलझाना होगा । स्त्रियों को बड़े से बड़े दुख सहने की आदि काल से ही आदत है । यही कारण है कि किसी अपवाद को यदि छोड़ दिया जाए तो स्त्रियों में हृदयाघात से मौत नहीं होती क्योंकि वह जीवन भर ही तो आघात सहन करती रहती है और दूसरों को सदा सुख देती रहती है । ऐसे में उनका ह्रदय जो प्रकृति से कोमल होते हुए भी इतना अत्यधिक कठोर हो चुका होता है कि वह बड़े से बड़े आघात को सहने में स्वत ही सक्षम ह...

** तुलसी के राम **

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               **तुलसी के राम** तुलसीदास के राम उस जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं ।  जो अपने आत्म बल के बूते पर आंतरिक स्थितियों से सामंजस्य बैठाती हुई अन्याय और असत्य के संघर्ष को न्याय और सत्य से झेलती है ।  इनका एक ही लक्ष्य है - सत्य और एक ही अस्त्र है - विवेक ।  तुलसीदास के राम केवल अन्याय के प्रतिरोदार्थ अस्त्र उठाते हैं । इनके लिए युद्ध वह  स्थिति है जो सत्य और न्याय के सारे द्वार बंद कर देती है । वह स्थिति थोप दी जाती है और जिसे राग द्वेष रहित होकर हटाने के सिवा और कोई दूसरा चारा नहीं है ।  यह साधन हीन का साधन संपन्न से संघर्ष है ।  इसकी चरम परिणति तब दिखाई देती है जब रावण रथारूढ़ होकर युद्ध भूमि में आता हे । और साधन हीन राम रथ की कौन कहे तन - पद - प्राण तक के बिना उसका सामना करने के लिए सन्नद्ध होते हैं । युग - संशय के रूप में विभीषण इस संघर्ष की प्रकृति और परिणाम के प्रति आशंकित होकर धीरज खो बैठते है । राम के इस कार्य के संघर्ष के क्या मायने हैं । वह समझ नहीं पाते ।  तुलसीदास के राम भरत सीता...

: स्त्री :

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               -------   #   -------- किसी भी समाज के सुसंस्कृत और विकसित होने की कसौटी स्त्री हो सकती है । इस तरह साहित्य में भी समाज की उन्नति अवनति का प्रतीक बन जाती है ।  वैदिक काल में स्त्री को एक सशक्त व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जाता था । इतना ही नहीं धार्मिक अनुष्ठान से लेकर राजनीतिक कार्यों में भी स्त्री की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी ।  परंतु कुछ समय के पश्चात स्त्री को शारीरिक दुर्बलता के कारण समाज में उसका स्थान गौण होने लगा । पुरुष ने भी उसकी इस गिरती हुई दशा को सुधारने का प्रयत्न नहीं किया ।  पुरुष ने मात्र देवी बनाकर कर तथा पवित्रता का स्वांग भरकर कर या कहीं मनोविनोद की वस्तु बनाकर स्त्री जाति को जड़ बना दिया । प्रत्येक युग की आवश्यकता के अनुरूप तथा समाज को अनुशासित करने की दृष्टि से कुछ नियम या उप नियम बनाए जाते रहे हैं ।  जो कालांतर में परंपरा या रूढ़ि के रूप में विकसित हो जाते हैं नए युग नए मूल्यों की स्थापना के साथ ही रूडी परंपरा का विरोध भी होने लग जाता है । सा...

स्त्री

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जीवन में सब कुछ इतनी सुगमता और सरलता से चलता रहे । यह हमेशा नहीं होता है क्योंकि जिस प्रकार हर दिन के बाद काली रात अवश्य आती है ।  ठीक उसी प्रकार सुख के बाद दुख भी आता है और प्रत्येक व्यक्ति को सुख और दुख का सामना जीवन में करना ही पड़ता है । The earth is a stage man is actor and god is director .  यानी यह पृथ्वी रंगमंच है मानव अभिनय करता है और प्रभु कहे ईश्वर कहें या अल्लाह कहें वही सब को निर्देशित करने वाला है समाज की गतिविधियों को देखते हुए मशहूर लेखक व नाटककार विलियम शेक्सपियर की सदियों पहले की गई यह टिप्पणी आज के आधुनिक समाज में भी एकदम सटीक बैठती है ।  आधुनिक समाज में शिक्षा का स्तर होने के कारण स्त्रियों में काफी जागरूकता आई है । उन्होंने अपनी खुद की पहचान और मनोबल शिक्षा से ही प्राप्त किया है । जिससे एक बहुत बड़ा बदलाव हमें देखने को मिलता है ।  इस बात को आधुनिक पुरूष भी समझ रहा है और आधुनिक  स्त्रियों को समाज में सुरक्षित रखने के लिए बहुत ही कड़ी भूमिका निभानी पड़ रही है ।  क्योंकि वर्तमान समय में भी पुरुष को आजादी स्त्री को देने के लिए ...

शिक्षा और राजनीति

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पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश के सामने जो भी बहुत पेचीदा समस्याएं आई है । उनमें हमारे विश्वविद्यालय भी रहे हैं हड़ताल ,  झगड़े ,  गोली ,  लाठियां ,  गाली गलोज ,  तिहार बाजी मुकदमें जांच कमीशन और और न जाने क्या क्या  ,,,,???  एक जमाना था जब विश्वविद्यालय देश के सांस्कृतिक जीवन के पवित्रतम तीर्थ माने जाते थे और आज मधुमक्खियों के छत्ते मधु कम होता जा रहा है ।  संगठन और समस्याएं बढ़ती जा रही है ,,,,  कारण ढूंढिए  तो ले देकर एक ही बात ---- की कुछ अध्यापक शोध अध्ययन पठन-पाठन की अपेक्षा विश्वविद्यालय की राजनीति और अपने स्वार्थ साधन में ज्यादा रुचि लेते हैं  । हमारे देश की समस्याओं में विश्वविद्यालयों में भी राजनीतिक दांवपेच हड़ताल गोली आदी हो रहे हैं ।  इन विश्वविद्यालयों में विभिन्न प्रकार की समस्याओं को बढ़ाने में अपना योगदान दिया है ।  अध्यापक भी राजनीति और अपने स्वार्थ साधन में ज्यादा रुचि लेने लगे हैं ।  आशय है कि कार्य करने वाले व्यक्तियों तथा कर्मचारियों की संख्या तो निरंतर बढ़ रही है परंतु उनकी कार्य क्षमता उस अनुप...

मापदण्ड ,,,,

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प्रत्येक सभ्यता के कुछ मूलभूत मूल्य और विश्वास होते हैं ।  जिनकी भित्ति पर सामाजिक संरचना निर्मित होती है  । स्त्री और पुरुष के संबंधों की नैतिक मर्यादा और संस्थानात्मक परिणति या उन मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है और उस समाज की व्यवस्था का परिचय भी देती है ।  स्त्री और पुरुष के संबंध सर्वकालिक और सर्वदेशिक होते हुए भी प्रत्येक समाज में प्रत्येक युग में अलग-अलग मूल्यों का रस व्याप्त रहता है । उन संबंधों की आकृतियां अनेक है उनके कलेवर और उनकी साज-सज्जा में आंचलिक विचित्रताये भी है उनकी शैली और शब्दावली भी भिन्न है ।  समाज व्यवस्था का आधार सभ्यता के कुछ मूल्य और विश्वास है ।  जो स्त्री-पुरुष संबंधों की मर्यादाओं और संस्थानात्मक परिणीतियो प्रतिबिंबित होते हैं । यह स्त्री पुरुष संबंध सर्व देशिक और सार्वकालिक होते हुए भी युग और समाज के अनुरूप कुछ भिन्नता रखते हैं । इसलिए और पुरुष के संबंधों की नैतिक मर्यादाऐ उनके मूल्यों प्रतिबिंब है जो कि समाज व्यवस्था का परिचय प्रदान करती है ।  स्त्री और पुरुष के प्रकृति प्रदत भेद को भी स्पष्ट किया जा सकता है कि पुरुष के रसास...